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राम-राम जपना, वोट अपना! अखिलेश यादव का यू-टर्न, पहले मंदिर से परहेज अब मंदिर-मंदिर टेक रहे माथा, क्या BJP का वोट बैंक टूटेगा?

UP Assembly Elections 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी ने अपनी रणनीति बदलते हुए सामाजिक न्याय के साथ सॉफ्ट हिंदुत्व को भी अपनाया है.

UP Assembly Elections 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने अपनी राजनीतिक लाइन में बड़ा बदलाव किया है. पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव अब केवल सामाजिक न्याय की राजनीति तक सीमित नहीं हैं बल्कि धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को भी अपनी रणनीति का हिस्सा बना रहे हैं. मंदिरों में दर्शन, भगवान श्रीराम पर बयान और धार्मिक आयोजनों में सक्रियता उनकी नई छवि को सामने ला रही है.

लोकसभा चुनाव के बाद नई सोच

2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे के साथ बड़ी सफलता हासिल की थी. अब पार्टी इस सामाजिक गठजोड़ को कायम रखते हुए हिंदू मतदाताओं के बीच भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है. विश्लेषकों का कहना है कि अखिलेश यादव सामाजिक न्याय और धार्मिक आस्था दोनों को साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहे हैं.

राम मंदिर पर बदला हुआ रुख

पहले बीजेपी सपा पर आरोप लगाती थी कि वह राम मंदिर और हिंदुत्व से दूरी बनाए रखती है लेकिन अब हालात बदल गए हैं. राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर अखिलेश यादव लगातार मुखर हैं. वे कहते हैं कि प्रभु श्रीराम सबके हैं और हर सनातनी परिवार में रामदरबार की परंपरा है. साथ ही बीजेपी पर आरोप लगाते हैं कि उसने आस्था और संविधान दोनों का अपमान किया है.

धार्मिक गतिविधियों में बढ़ी भागीदारी

अखिलेश यादव और उनके परिवार की धार्मिक गतिविधियां भी बढ़ गई हैं. वे कई मंदिरों में दर्शन कर चुके हैं और कन्नौज में केदारेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण करवा रहे हैं. उनकी पत्नी डिंपल यादव और बच्चे भी मंदिरों में पूजा-अर्चना करते दिखाई दिए हैं. हाल ही में उनके बेटे अर्जुन और बेटी टीना काशी विश्वनाथ मंदिर गए थे. सैफई में भंडारा आयोजन भी हुआ. इन सबको उनकी नई राजनीतिक शैली का हिस्सा माना जा रहा है.

PDA और हिंदुत्व का संतुलन

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती PDA वोट बैंक को बनाए रखते हुए हिंदू मतदाताओं के एक हिस्से तक पहुंच बनाना है. इसी वजह से वे सामाजिक न्याय और पिछड़े-दलित अधिकारों की बात करते हैं, साथ ही धार्मिक आयोजनों और भगवान श्रीराम से जुड़े मुद्दों पर भी खुलकर बोलते हैं. यह रणनीति बीजेपी को धार्मिक ध्रुवीकरण का फायदा उठाने से रोकने की कोशिश है.

डिजिटल अभियान और संगठन

हाल ही में अखिलेश यादव ने ‘PDA स्वाभिमान सहयोग अभियान’ शुरू किया है. इसके तहत QR कोड के जरिए न्यूनतम 20 रुपये का सहयोग लेकर पार्टी फंड जुटाने की पहल की गई है. साथ ही डिजिटल सदस्यता अभियान भी शुरू किया गया है. पार्टी का दावा है कि यह केवल चंदा जुटाने का तरीका नहीं बल्कि बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने की योजना है.

बीजेपी बनाम सपा की नई लाइन

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बीजेपी लंबे समय से हार्ड हिंदुत्व की राजनीति करती रही है. राम मंदिर, काशी, मथुरा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद उसके प्रमुख मुद्दे रहे हैं. इसके मुकाबले सपा अब धार्मिक आस्था को स्वीकार करते हुए बीजेपी पर आरोप लगा रही है कि उसने आस्था का राजनीतिक इस्तेमाल किया है. अखिलेश यादव का कहना है कि भगवान श्रीराम सबके हैं लेकिन धर्म के नाम पर राजनीति नहीं होनी चाहिए.

ज्योतिष और सांस्कृतिक संदेश

अखिलेश यादव ने हाल के महीनों में सार्वजनिक मंचों पर ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं का भी जिक्र किया है. प्रयागराज में उन्होंने मंदिर दर्शन और शुभ-अशुभ संकेतों पर बातें कीं. साथ ही अपने कार्यकर्ताओं को धार्मिक मामलों पर विवादित टिप्पणी करने से मना किया है ताकि बीजेपी को कोई नया मुद्दा न मिले.

क्या बीजेपी को चुनौती मिलेगी?

विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है. कुछ का मानना है कि यदि सपा PDA गठजोड़ को बनाए रखते हुए हिंदू मतदाताओं तक पहुंचने में सफल रहती है तो 2027 का चुनाव बीजेपी के लिए कठिन हो सकता है. वहीं दूसरी राय यह है कि हिंदुत्व के मुद्दे पर बीजेपी की पकड़ अभी भी मजबूत है और केवल धार्मिक प्रतीकों से उसका मुकाबला करना आसान नहीं होगा.

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2027 का नया अध्याय

यह तय है कि 2027 का चुनाव केवल जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं रहेगा. बीजेपी विकास और हार्ड हिंदुत्व के एजेंडे के साथ मैदान में होगी जबकि सपा PDA, सामाजिक न्याय और धार्मिक-सांस्कृतिक स्वीकार्यता के मिश्रण के साथ नई जमीन तैयार करने की कोशिश करेगी. अखिलेश यादव की यह रणनीति कितनी सफल होगी इसका फैसला चुनाव परिणाम ही करेंगे.

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-भारत एक्सप्रेस



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