हरियाणा के धनौरा गांव के लिए तारीख 30 जून 2026, दिन मंगलवार की सुबह बेहद मनहूस सुबह थी. 4 साल का मासूम निर्भय अपने पिता मनजीत सिंह के साथ जिद करके खेत में दादा को खाना देने गया था. दादा खाना खा रहे थे और मासूम पास ही खेल रहा था. खेलते-खेलते उसकी नजर खेत में मौत की तरह मुंह बाए खुले पड़े एक 9 इंच चौड़े और 220 फीट गहरे खौफनाक बोरवेल पर पड़ी. बच्चा नासमझी में उसमें मिट्टी डालने लगा और अचानक पैर फिसलने से वह सीधा उस अंधेरी खाई में समा गया. लगातार 21 घंटे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया. लेकिन जब बुधवार की सुबह तड़के 3:30 बजे पथरीली जमीन को चीरकर मासूम को बाहर निकाला गया, तब तक उसकी सांसें टूट चुकी थीं.
अंबाला की इस त्रासदी ने एक बार फिर देश के सामने वही पुराना, कड़वा और यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि आखिर इन मासूमों की मौत का ‘दोषी कौन?’ क्योंकि, यह पहली बार नहीं है जब कोई मासून इस तरह से बोरवेल में अपने जान गवां बैठा हो. इससे पहले भी देश में कई बच्चों का जान इसके कारण चली गई है. आइये जानें आखिर इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट क्या कहती है और शासन, प्रशासन के साथ ही समाज की क्या जिम्मेदारी है?
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जब-जब सुलगती है देश की अंतरात्मा
भारत में खुले बोरवेल के कारण होने वाले ये हादसे कोई नए नहीं हैं. जब भी कोई बच्चा गिरता है, प्रशासनिक अमला जागता है, करोड़ों का खर्च होता है और फिर सब शांत हो जाता है. इतिहास के पन्नों पर दर्ज कुछ ऐसी ही बड़ी घटनाएं देश को झकझोर चुकी हैं.
कुरुक्षेत्र का प्रिंस (21 जुलाई 2006): हरियाणा के कुरुक्षेत्र (कथित तौर पर गुरुग्राम/कुरुक्षेत्र बेल्ट) में 5 साल का प्रिंस 60 फीट गहरे बोरवेल में गिर गया था. सेना ने 50 घंटे से ज्यादा रेस्क्यू चलाकर उसे सुरक्षित निकाला था, जिसने देश में पहली बार इस मुद्दे पर जनहित याचिकाओं की बाढ़ ला दी थी.
त्रिची का सुजीत (अक्टूबर 2019): तमिलनाडु के त्रिची में 2 साल का सुजीत विल्सन खुले बोरवेल में गिरा था. सेना और एनडीआरएफ की तमाम कोशिशों के बावजूद 80 घंटे बाद उसकी सड़ी-गली लाश ही बाहर निकाली जा सकी थी.
जालौर का अनिल (2021): राजस्थान के जालौर में एक और मासूम खुले बोरवेल की लापरवाही का शिकार बना था, जहां रेस्क्यू टीम के पहुंचने से पहले ही दम घुटने से उसकी मौत हो गई थी.
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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
खुले नलकूपों और बोरवेल के कारण बच्चों की लगातार हो रही मौतों को रोकने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने 6 अगस्त 2010 को एक ऐतिहासिक मार्गदर्शिका (गाइडलाइन) जारी की थी. तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एस.एच. कपाड़िया, जस्टिस के.एस. राधाकृष्णन और जस्टिस स्वतंत्र कुमार की पीठ ने इस संबंध में कड़े नियम बनाए थे, जो आज भी पूरे देश में लागू हैं. हालांकि, कड़वी हकीकत यह है कि जमीनी स्तर पर इसका क्रियान्वयन आज तक नहीं हो सका.
क्या कहती है सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक गाइडलाइन?
- लिखित सूचना अनिवार्य: नलकूप या बोरवेल की खुदाई शुरू करने से कम से कम 15 दिन पहले संबंधित जिला कलेक्टर, ग्राम पंचायत या स्थानीय प्रशासन को लिखित रूप से सूचित करना होगा.
- पंजीकृत ठेकेदार: खुदाई करने वाली सरकारी, अर्ध-सरकारी संस्था या निजी ठेकेदार का बकायदा संबंधित विभाग में पंजीकरण होना अनिवार्य है.
- चेतावनी साइन बोर्ड: खुदाई वाले स्थान के पास अनिवार्य रूप से एक बड़ा चेतावनी साइन बोर्ड लगाया जाना चाहिए, जिस पर खतरे का संकेत हो.
- कंटीली फेंसिंग: निर्माण या खुदाई के दौरान बोरवेल के चारों तरफ कंटीले तारों या मजबूत जाली की फेंसिंग (घेराबंदी) की जानी चाहिए.
- कंक्रीट का प्लेटफार्म: केसिंग पाइप के चारों ओर जमीन से कम से कम 0.30 मीटर ऊंचा कंक्रीट या सीमेंट का पक्का प्लेटफार्म बनाना अनिवार्य है.
- स्टील प्लेट वेल्डिंग: बोरवेल के मुहाने को खुली अवस्था में नहीं छोड़ा जा सकता. इसे स्टील की मजबूत प्लेट से वेल्ड किया जाना चाहिए या नट-बोल्ट से अच्छी तरह कसकर बंद रखा जाना चाहिए.
- मरम्मत के समय सावधानी: यदि मोटर या पंप की मरम्मत का काम चल रहा हो, तो उस अवधि के दौरान भी नलकूप के मुंह को खुला नहीं छोड़ा जा सकता, उसे ढक कर रखना होगा.
- जमीन का समतलीकरण: खुदाई का काम पूरा होने के बाद आसपास खोदे गए मिट्टी के गड्ढों और मलबे को हटाकर जमीन को पूरी तरह समतल किया जाना चाहिए.
- अधूरी खुदाई पर सख्त नियम: यदि किसी कारणवश खुदाई का काम अधूरा छोड़ दिया जाता है, तो उस गहरे गड्ढे को मिट्टी, रेत, बजरी या बोल्डर डालकर पूरी तरह जमीन की सतह तक ठोककर भरा जाना चाहिए.
क्यों खुले छोड़ दिए जाते हैं ये ‘मौत के कुएं’
सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार, इन सभी नियमों को कड़ाई से जमीन पर लागू कराने की अंतिम और सीधी जिम्मेदारी जिला कलेक्टर (DM) की निर्धारित की गई है. वे यह सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेह हैं कि चाहे कोई सरकारी एजेंसी काम कर रही हो या कोई निजी किसान, नियमों की अनदेखी बिल्कुल न हो. इसके बावजूद जमीनी स्तर पर इतनी बड़ी लापरवाही के पीछे कई प्रमुख कारण काम करते हैं.
- पैसे बचाने का लालच: मात्र कुछ सौ रुपये बचाने के चक्कर में किसान या ठेकेदार लोहे के मजबूत ढक्कन या वेल्डिंग की व्यवस्था नहीं करते और बोरवेल को खुला छोड़ देते हैं.
- भविष्य की झूठी उम्मीद: कई किसान इस लालच में भी बोरवेल को खुला रखते हैं कि शायद अगले साल जलस्तर सुधरने पर वे इसमें दोबारा पंप डालकर पानी निकाल सकेंगे.
- गलतफहमी और लापरवाही: खेत मालिकों को अक्सर यह मुगालता रहता है कि उनके निजी खेतों में बच्चों या आम लोगों का आना-जाना नहीं होता, इसलिए वे इसे सुरक्षा के नजरिए से गंभीरता से नहीं लेते.
- संस्थागत लापरवाही: कई सरकारी या निजी ठेकेदार अपनी व्यावसायिक लापरवाही के कारण काम अधूरा छोड़ कर भाग जाते हैं, जिससे वे गड्ढे मौत का जाल बन जाते हैं.
क्या है इसका स्थाई समाधान?
जब भी ऐसी कोई दर्दनाक घटना होती है, तो एक मासूम की जान तो खतरे में पड़ती ही है, साथ ही राज्य के प्रशासनिक और सैन्य संसाधनों का भारी अपव्यय होता है. सेना, एनडीआरएफ, एयरफोर्स के चॉपर्स और पोकलेन जैसी बड़ी-बड़ी भारी मशीनों को रात-दिन काम पर लगाया जाता है, जिससे सरकारी खजाने पर लाखों-करोड़ों का भारी वित्तीय खर्च आता है. लेकिन इस खर्च से भी बड़ा नुकसान उस परिवार का होता है, जो अपने बच्चे को तड़पते देख जीवनभर के मानसिक और शारीरिक सदमे का शिकार हो जाता है. इस राष्ट्रीय समस्या का स्थाई समाधान केवल और केवल निम्नलिखित कड़े प्रशासनिक और सामाजिक कदमों से ही संभव है:
- स्थानीय प्रशासन की सख्त निगरानी: जिला प्रशासन, तहसील और ग्राम पंचायतों को अपने-अपने क्षेत्रों में खुले पड़े नलकूपों की पहचान करने के लिए विशेष अभियान चलाना होगा.
- नियमित ऑडिट और जांच: हर ग्रामीण और शहरी इलाके में चालू व बंद पड़े बोरवेलों की अनिवार्य और नियमित भौतिक जांच होनी चाहिए.
- कठोर दंडात्मक और कानूनी कार्रवाई: जो भी भूमि मालिक या ठेकेदार नियमों का उल्लंघन करता पाया जाए, उसके खिलाफ गैर-इरादतन हत्या (Under Relevant Sections of BNS) का मुकदमा दर्ज कर भारी जुर्माना और जेल की सजा का प्रावधान होना चाहिए.
सामाजिक जागरूकता और स्व-विवेक
अंततः कानून से ज्यादा आम नागरिकों और किसानों को स्वयं जागरूक होना होगा कि उनके खेत में खुला पड़ा एक गड्ढा किसी भी मासूम के जीवन का अंत कर सकता है. नियमों का कड़ाई से पालन करना केवल कानूनी बाध्यता नहीं, बल्कि एक नैतिक मानवीय कर्तव्य भी है.
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