आज का दिन यानी 8 अप्रैल भारतीय साहित्य और राष्ट्रवाद के उस ‘ऋषि’ की पुण्यतिथि, जिन्होंने अपनी लेखनी को आजादी की लड़ाई का सबसे धारदार हथियार बना दिया था. हम बात कर रहे हैं ‘साहित्य सम्राट’ बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की. आज का दिन न केवल उनके साहित्य को याद करने का है, बल्कि उस ‘अमृत मंत्र’ को नमन करने का है जिसने भारत माता के स्वरूप को जन-जन के हृदय में जीवंत कर दिया. इस अवसर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बंकिम बाबू को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है. शाह ने विशेष रूप से बंकिम चंद्र जी द्वारा भारतीय स्वाभिमान को जगाने और ‘वन्दे मातरम्’ के जरिए देश को एक सूत्र में पिरोने के ऐतिहासिक कार्य को रेखांकित किया.
आजादी की लड़ाई को दिया एकता का स्वर
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर अपनी भावनाएं व्यक्त की. शाह ने कहा, ‘महान देशभक्त और राष्ट्रवादी साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी की पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं. बंकिम बाबू ने मुगल आक्रांताओं और अंग्रेजी शासकों के शोषण और अन्याय से आहत भारतीय स्वाभिमान को जगाने का अविस्मरणीय कार्य किया. उन्होंने ‘वन्दे मातरम्’ के माध्यम से भाषा, क्षेत्र और प्रांत में बंटी आजादी की लड़ाई को एकता का स्वर दिया.’
महान देशभक्त और राष्ट्रवादी साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी की पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
बंकिम बाबू ने मुगल आक्रांताओं और अंग्रेजी शासकों के शोषण और अन्याय से आहत भारतीय स्वाभिमान को जगाने का अविस्मरणीय कार्य किया। उन्होंने ‘वन्दे मातरम्’ के… pic.twitter.com/Fti0qX7WGG— Amit Shah (@AmitShah) April 8, 2026
अमित शाह ने आगे कहा कि मां भारती के विशाल स्वरूप को देशवासियों के सामने ‘आनंद मठ’ के माध्यम से जीवंत बनाकर युवाओं को स्वाधीनता और मातृभूमि की रक्षा के लिए प्रेरित करने वाले बंकिम बाबू का यह देश, यह सभ्यता और यह महान संस्कृति अनंत काल तक ऋणी रहेगी.
‘आनंद मठ’ और सन्यासी विद्रोह की गूंज
अमित शाह ने अपने पोस्ट में जिस ‘आनंद मठ’ का जिक्र किया है, वो केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद का घोषणापत्र माना जाता है. 18वीं शताब्दी के सन्यासी विद्रोह पर आधारित इस कृति ने उस समय के युवाओं में वो जोश भर दिया था, जिससे ब्रिटिश हुकूमत घबरा उठी थी. इसी उपन्यास से हमें ‘वन्दे मातरम्’ जैसा राष्ट्रीय गीत मिला, जो आजादी के मतवालों के लिए फांसी के फंदे पर झूलते समय भी सबसे बड़ा सहारा था.
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पुरोधा
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का योगदान केवल साहित्य तक सीमित नहीं था. वे एक कुशल प्रशासक (डिप्टी मजिस्ट्रेट) होने के बावजूद कभी अंग्रेजों के दबाव में नहीं झुके. उन्होंने अपनी लेखनी के जरिए यह साबित किया कि जब तक कोई समाज अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने इतिहास पर गर्व नहीं करता, वो कभी पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं हो सकता.
-भारत एक्सप्रेस
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