वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और कूटनीति में आज ‘BRICS’ (ब्रिक्स) एक ऐसा नाम बन चुका है, जिसकी आवाज से लेकर फैसले तक पूरी दुनिया को प्रभावित करते हैं. पश्चिमी देशों के दबदबे को चुनौती देने वाला यह संगठन आज दुनिया की आधी आबादी और एक तिहाई जीडीपी का प्रतिनिधित्व करता है.
लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस बहुचर्चित संगठन का नाम किसी भारी-भरकम राजनीतिक संधि पर नहीं बल्कि अंग्रेजी के शब्द ‘BRICK’ यानी ‘ईंट’ की मजबूती से प्रेरित होकर रखा गया था? आइए जानते हैं साल 2000 से शुरू हुए इस आर्थिक सफर की पूरी दिलचस्प टाइमलाइन और इसके एक वैश्विक महा-संगठन बनने की इनसाइड स्टोरी.
साल 2000: ‘ईंट’ की तरह उभरती चार नई आर्थिक महाशक्तियां
2000 के दशक की शुरुआत में पूरी दुनिया की नजरें चार उभरते हुए देशों पर टिकी थीं-ब्राजील, रूस, इंडिया (भारत) और चीन. ये चारों देश वैश्विक मानचित्र पर सबसे तेजी से जीडीपी ग्रोथ दर्ज कर रहे थे. इन देशों के पास विशाल प्राकृतिक संसाधन, तेजी से बढ़ती आबादी और विशाल घरेलू बाजार मौजूद था. आर्थिक विशेषज्ञों का मानना था कि आने वाले दशकों में ये चारों देश वैश्विक अर्थव्यवस्था की एक ऐसी मजबूत नींव या ‘ईंट’ साबित होंगे, जिसके बिना दुनिया का आर्थिक ढांचा खड़ा नहीं रह सकता.
साल 2001: ब्रिटिश इकोनॉमिस्ट ने गढ़ा था ‘BRIC’ शब्द
इस ऐतिहासिक शब्द को पहली बार दुनिया के सामने लाने का श्रेय प्रसिद्ध ब्रिटिश अर्थशास्त्री जिम ओ’नील (Jim O’Neill) को जाता है. साल 2001 में दुनिया के मशहूर इन्वेस्टमेंट बैंक ‘गोल्डमैन सैक्स’ (Goldman Sachs) में मुख्य अर्थशास्त्री के रूप में काम करते हुए उन्होंने अपनी एक ग्लोबल रिसर्च रिपोर्ट तैयार की.
बता दें इस रिपोर्ट में उन्होंने चारों देशों के अंग्रेजी नाम के पहले अक्षरों (B-Brazil, R-Russia, I-India, C-China) को मिलाकर ‘BRIC’ शब्द गढ़ा. शुरुआत में यह केवल एक आर्थिक अवधारणा (Concept) और निवेश का एक फॉर्मूला मात्र था.
साल 2009: जब पहली बार एक मंच पर आए 4 देश
लगभग आठ सालों तक वित्तीय गलियारों में केवल एक आर्थिक रिपोर्ट के रूप में इस्तेमाल होने के बाद, इन चारों देशों के नेताओं को यह अहसास हुआ कि उन्हें केवल वैश्विक निवेशकों का आकर्षण बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि एक रणनीतिक गुट बनाना चाहिए.
साल 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के शीर्ष नेताओं की पहली औपचारिक शिखर बैठक (Summit) हुई. इस बैठक के साथ ही ‘BRIC’ एक कागजी रिसर्च रिपोर्ट से निकलकर एक औपचारिक और मजबूत अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में दुनिया के सामने आ गया.
साल 2010: साउथ अफ्रीका की एंट्री और जुड़ गया ‘S’
संगठन की बढ़ती साख और प्रभाव को देखते हुए इसके विस्तार की प्रक्रिया जल्द ही शुरू हो गई. औपचारिक गठन के ठीक एक साल बाद, यानी साल 2010 में अफ्रीकी महाद्वीप की सबसे बड़ी और मजबूत अर्थव्यवस्था वाले देश साउथ अफ्रीका (दक्षिण अफ्रीका) को भी इस समूह में शामिल कर लिया गया. साउथ अफ्रीका के जुड़ते ही इसके नाम के आगे ‘S’ (South Africa) अक्षर जुड़ गया और यह आधिकारिक तौर पर ‘BRIC’ से बदलकर ‘BRICS’ (ब्रिक्स) बन गया.
क्यों कांपते हैं पश्चिमी देश?
एक दौर में सिर्फ ‘ईंट’ की तरह आर्थिक मजबूती दर्शाने वाला यह संगठन आज विश्व राजनीति का नया केंद्र बन चुका है. नई विकास बैंक (NDB) की स्थापना, डॉलर के बिना अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की पहल और लगातार नए सदस्य देशों के जुड़ने से ब्रिक्स ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के वर्चस्व को सीधी चुनौती दी है. भारत की अगुवाई में ब्रिक्स आज केवल आर्थिक साझेदार नहीं बल्कि वैश्विक शांति, बहुपक्षवाद और निष्पक्ष दुनिया की आवाज बन चुका है.
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-भारत एक्सप्रेस
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