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सीआरपीएफ के ग्राउंड कमांडर्स की पदोन्नति पर संकट, 15 साल से इंतजार

सीआरपीएफ के ग्राउंड कमांडर्स लगभग 15 वर्षों से अपनी पहली पदोन्नति का इंतजार कर रहे हैं. इस लंबित पदोन्नति के कारण अफसरों के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है

सीआरपीएफ के ग्राउंड कमांडर्स

CRPF

केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल: केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के ग्राउंड कमांडर्स, यानी सहायक कमांडेंट्स, करीब 15 वर्षों से अपनी पहली पदोन्नति का इंतजार कर रहे हैं. स्थिति यह है कि देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल में लगभग 150 डिप्टी कमांडेंट (डीसी) के पद रिक्त हैं, लेकिन इसके बावजूद सहायक कमांडेंट्स को डिप्टी कमांडेंट पद पर प्रोमोशन नहीं मिल पा रहा है. इस लंबित पदोन्नति के कारण अफसरों के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, जबकि यही अधिकारी आतंकवाद, नक्सलवाद, चुनाव ड्यूटी और आपदा प्रबंधन जैसी अहम जिम्मेदारियां निभाते हैं.

कोर्ट केस का हवाला, लेकिन समाधान नहीं

कैडर अधिकारियों के अनुसार, बल मुख्यालय अक्सर अदालत में चल रहे मामलों का हवाला देकर प्रोमोशन प्रक्रिया को टाल देता है. हालांकि, बल मुख्यालय द्वारा इस समस्या को सुलझाने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाने का संकेत नहीं दिया गया है. यह भी आरोप लगते हैं कि बल मुख्यालय, अदालत के समक्ष सही ढंग से पैरवी नहीं करता, जिससे समाधान और अधिक जटिल हो जाता है.

गृह मंत्रालय उठा सकता है कदम

सूत्रों के अनुसार, दिसंबर 2024 में केंद्रीय गृह मंत्रालय में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में यह मुद्दा उठाया गया था. गृह मंत्री अमित शाह ने अधिकारियों से कहा कि अदालत में मजबूत पैरवी कर सहायक कमांडेंट्स की पदोन्नति का रास्ता खोला जाए. गृह मंत्री ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और बल मुख्यालय को जल्द से जल्द समाधान निकालने के निर्देश दिए. अब बताया जा रहा है कि इस समस्या को खत्म करने के लिए वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों की राय ली जा रही है.
ग्राउंड कमांडरों की समस्याएं और अधिकारियों का संघर्ष

सीआरपीएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि वर्षों से पदोन्नति का इंतजार कर रहे ग्राउंड कमांडरों को डीसी के रिक्त पदों पर ‘अगेंस्ट द वैकेंसी ऑफ डीसी’ के तहत पोस्टिंग तक नहीं दी जा रही. समय पर प्रोमोशन न मिलने के कारण इन अधिकारियों का मनोबल टूट रहा है.

बल के कई ग्राउंड कमांडर अपने हक की लड़ाई के लिए अदालत का सहारा ले रहे हैं. कई मामलों में अदालत ने अधिकारियों के पक्ष में फैसले दिए हैं, लेकिन विभाग ने इसके बाद भी लाभ देने में देरी की.

अधिकारियों ने शिकायत की है कि उनके वित्तीय लाभ, मकान भत्ता, राशन मनी, और डिटैचमेंट एलाउंस जैसे अधिकार भी समय पर नहीं दिए जाते. कई मामलों में विभाग ने दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक में रिव्यू पिटीशन दाखिल किए हैं.

कैडर रिव्यू की प्रक्रिया में देरी

सीआरपीएफ और बीएसएफ में कैडर रिव्यू की प्रक्रिया समय पर नहीं हो रही. नियमानुसार, हर पांच साल में कैडर रिव्यू पूरा होना चाहिए, लेकिन सीआरपीएफ में पिछला कैडर रिव्यू 2016 में हुआ था. वर्तमान में 2025 में भी यह प्रक्रिया अधूरी है.

कैडर रिव्यू फाइल कई बार एक टेबल से दूसरी टेबल पर घूमती रही है. कभी अदालत में मामला लंबित होने का हवाला दिया जाता है, तो कभी विशेषज्ञों की राय का इंतजार किया जाता है.

बल से पलायन का संकट

इन लंबित समस्याओं के कारण सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी और अन्य केंद्रीय बलों में 50,000 से अधिक कर्मियों ने पिछले पांच वर्षों में नौकरी छोड़ दी है. यह एक चिंताजनक स्थिति है, क्योंकि सिपाही से लेकर सहायक कमांडेंट तक के रैंक वाले कर्मी अपने भविष्य को लेकर आशंकित हैं.
हालांकि, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस मुद्दे पर सक्रियता दिखाई है और अदालत में ठोस पैरवी के लिए निर्देश दिए हैं. यदि बल मुख्यालय इस दिशा में तेजी से कदम उठाता है, तो यह ग्राउंड कमांडरों के लिए राहत भरा कदम होगा.

सीआरपीएफ के ग्राउंड कमांडर्स की इस लंबित समस्या ने न केवल बल के संचालन को प्रभावित किया है, बल्कि अधिकारियों के मनोबल और उनके कैरियर पर भी गहरा प्रभाव डाला है. अब देखना यह है कि गृह मंत्रालय और बल मुख्यालय इस गतिरोध को कब और कैसे खत्म करते हैं.

ये भी पढ़ें: गृह मंत्रालय ने इस साल अब तक देशभर में 67 संगठनों को FCRA मंजूरी दी 

-भारत एक्सप्रेस



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