दिल्ली हाईकोर्ट की संविधान पीठ ने एक अहम निर्णय में कहा है कि अब किसी भी आपराधिक मामले में पीड़ित को मुआवजा देने और उसका निर्धारण करने से पहले अभियुक्त को अपनी संपत्ति का हलफनामा नहीं देना होगा. पहले अभियुक्त को यह जानकारी हलफनामे के माध्यम से देनी होती थी, जिससे मुआवजा की गणना दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएसएलएसए) द्वारा की जाती थी. हालांकि, हाईकोर्ट ने इसे गलत ठहराया है और इस प्रक्रिया को बदलने का आदेश दिया है.
संपत्ति की जानकारी देने की आवश्यकता खत्म
संविधान पीठ ने कहा कि अब मुआवजा का निर्धारण अदालत ही करेगी, जिसमें अभियुक्त की आय और संपत्ति को ध्यान में रखा जाएगा. इसके लिए अदालत जांच अधिकारी या अभियोजन एजेंसी से जानकारी ले सकती है, लेकिन अभियुक्त से शपथ पत्र के जरिए संपत्ति की जानकारी प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होगी. जस्टिस रेखा पल्ली, जस्टिस प्रतिबा मनिंदर सिंह, जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद, जस्टिस सौरभ बनर्जी और जस्टिस मनोज जैन की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में मुआवजा का निर्धारण निचली अदालत के दायित्व और कर्तव्य के तहत किया जाएगा, और इसे डीएसएलएसए को नहीं सौंपा जा सकता.
मुआवजा निर्धारण में दोषी के हलफनामे का विरोध
कोर्ट ने कहा कि दोषी के द्वारा मुआवजा देने के लिए अपनी वित्तीय स्थिति का खुलासा करने वाला हलफनामा संविधान और वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है. इसके साथ ही पीठ ने यह भी कहा कि ऐसे हलफनामे का इस्तेमाल प्रवर्तन निदेशालय जैसी अन्य जांच एजेंसियां कर सकती हैं, जो दोषी के खिलाफ कार्रवाई कर सकती हैं. इसके अलावा, पीठ ने मुआवजा निर्धारण के दौरान ‘पीड़ित केंद्रित दृष्टिकोण’ अपनाने की बात की, ताकि पीड़ित को जल्द से जल्द न्याय मिल सके.
मुख्य न्यायाधीश का हस्तक्षेप
इस मामले में एकल पीठ ने मुआवजा निर्धारण में देरी पर गौर करते हुए मुख्य न्यायाधीश से बड़ी पीठ गठित करने की अपील की थी. इसके बाद मुख्य न्यायाधीश ने पांच सदस्यीय संविधान पीठ का गठन किया, जिसने इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय लिया.
-भारत एक्सप्रेस
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