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आपको मालूम है बंटवारे के समय भारत ने पाकिस्तान से कैसे जीती थी राष्ट्रपति की ये शाही बग्गी? बेहद दिलचस्प है इसके पीछे की कहानी

President House Bagghi: भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के समय काफी टकराव देखने को मिला था. इस बग्घी को पाकिस्तान से टॉस में जीता गया था. इसके पीछे की कहानी काफी दिलचस्प है.

royal carriage

शाही बग्गी

President House Bagghi: यूं तो आपने कई खेलों का फैसला टॉस से होते हुए जरूर देखा होगा लेकिन आज हम आपको एक ऐसी शानदार बग्घी के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे भारत ने पाकिस्तान से बटवारे में टॉस जीतकर हासिल किया था. ऐसे में आज हम आपको एक ऐसी ही खास चीज के बारे में बताएंगे जो बंटवारे के दौरान भारत से पाकिस्तान चाहता था. आइए जानते हैं क्या है पूरा किस्सा.

भारत और पाकिस्तान में हुआ बंटवारा

सन् 1947 में अंग्रेजों से हमारे देश को आजादी तो मिल गई थी लेकिन इस आजादी ने हमारे अखण्ड भारत के दो भागों में विभाजित होने पर विवश कर दिया. जिस कारण भारत और पाकिस्तान में जमीन से लेकर सेना तक हर चीज का बंटवारा हुआ. इसमें से एक ‘गवर्नर जनरल्स बॉडीगार्ड्स’ रेजीमेंट भी थी. इस रेजीमेंट का बंटवारा 2:1 के अनुपात में शांतिपूर्वक हो गया. लेकिन रेजिमेंट की मशहूर बग्घी को लेकर दोनों पक्षों के बीच बात नहीं बन पाई.

गणतंत्र दिवस पर बग्गी के बंटवारे की कहानी

गणतंत्र दिवस की परेड से लेकर बीटिंग द रिट्रीट कार्यक्रम के दौरान आपने राष्ट्रपति को सोने की रॉयल बग्गी में आते देखा होता. भारत में संविधान लागू होने के बाद 1950 में हुए पहले गणतत्र दिवस में देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद बग्गी पर ही सवार होकर गणतंत्र दिवस समारोह में पहुंचे थे. आजादी से पहले वायसराय और आजादी के बाद के कई साल तक देश के राष्ट्रपति इस शादी बग्गी की सवारी करते आए हैं. यह बग्गी देखने में जितनी शाही नजर आती है उसे पाकिस्तान से जीतने की कहानी उतनी ही दिलचस्प है.

भारत ने पाकिस्तान से कैसे जीती थी राष्ट्रपति की ये शाही बग्गी?

1947 में जब देश आजाद हुआ तो भारत और पाकिस्तान के बीच हर चीज का बंटवारा हुआ. दोनों देशों के बीच जमीन से लेकर सेना और अन्य सभी चीजों को बंटवारा होना था. इसके लिए नियम भी तय किए जाने थे.बंटवारे के समय भारत के प्रतिनिधि एच. एम. पटेल और पाकिस्तान के चौधरी मुहम्मद अली को ये अधिकार दिया गया था कि वो अपने अपने देश का पक्ष रखते हुए इस बंटवारे के काम को आसान करें. वहीं बात जब राष्ट्रपति के अंगरक्षकों की आई तो उन्हें दोनों देशों के बीच 2:1 के अनुपात से बांट दिया गया. आखिरी में वायसराय की बग्घी को लेकर दोनों देशों ने अपना-अपना दावा ठोक दिया.

टॉस के बाद हुआ फैसला

बग्घी को लेकर जब दोनों की देश अड़ गए तो इस विवाद को सुलझाने के लिए टॉस का सहारा लिया गया.उस दौरान राष्ट्रपति (तब वायसराय) के बॉडीगार्ड रेजिमेंट के पहले कमांडडेंट लेफ्टिनेंट कर्नल ठाकुर गोविंद सिंह और पाकिस्तानी सेना के साहबजादा याकूब खान के बीच बग्घी को लेकर टॉस हुआ. टॉस में भारत की जीत हुई और बग्घी भारत के हिस्से में आ गई.

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई बुलेटप्रुफ कार की एंट्री

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश के वीवीआईपी सुरक्षा की समीक्षा की गई थी. राष्ट्रपति की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बग्घी को हटा दिया गया और उसकी जगह बुलेटप्रूफ कार का इस्तेमाल किया जाने लगा. कई सालों तक राष्ट्रपति बुलेटप्रूफ कार का ही उपयोग करते रहे. हालांकि, 2014 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने एक बार फिर बग्घी का इस्तेमाल किया. वह बीटिंग रिट्रीट कार्यक्रम में शामिल होने के लिए इसी बग्घी में पहुंचे थे.

इसके बाद, 25 जुलाई 2017 को रामनाथ कोविंद ने भी राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद राष्ट्रपति भवन से संसद तक बग्घी से ही यात्रा की थी. प्रणब मुखर्जी से पहले, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और प्रतिभा पाटिल को भी कुछ खास अवसरों पर इस शाही बग्घी का इस्तेमाल करते देखा गया था. इस साल गणतंत्र दिवस के दौरान जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भारत आए, तो उन्होंने राष्ट्रपति के साथ इस शाही बग्घी का आनंद लिया.

-भारत एक्सप्रेस 



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