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“राष्ट्र प्रथम, धर्म अंतिम”: लखनऊ में राष्ट्रीय संगोष्ठी में एकता और नागरिक कर्तव्य का आह्वान

इरम गर्ल्स डिग्री कॉलेज में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी “एक समुदाय, एक राष्ट्र – हिंदुस्तान” में राजनीतिक नेताओं, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने देशभक्ति, नागरिक जिम्मेदारी और सामाजिक सद्भाव पर जोर दिया है.

देशभक्ति और सामूहिक जिम्मेदारी पर एक प्रभावी संवाद के केंद्र में, “एक समुदाय, एक राष्ट्र – हिंदुस्तान” विषय पर आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आज यहां इरम गर्ल्स डिग्री कॉलेज में संपन्न हुई. इस कार्यक्रम ने ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना की दिशा में सामाजिक सद्भाव और नागरिक कर्तव्य पर चर्चा के लिए राजनीतिक हस्तियों, शिक्षाविदों और समुदाय नेताओं को एक मंच पर लाया.

एकता का समागम

कार्यक्रम में आरएसएस के राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य एवं मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के संरक्षक डॉ. इंद्रेश कुमार और उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण, मुस्लिम वक्फ तथा हज राज्य मंत्री दानिश अंसारी ने अपने विचार रखे. इसके अलावा, पैनल में अन्य विशिष्ट वक्ता शामिल थे, जिनमें एनसीएमईआई के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. डॉ. शाहिद अख्तर; अंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति राज कुमार मित्तल; जामिया हमदर्द के रजिस्ट्रार कर्नल ताहिर मुस्तफा; मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक सैयद रज़ा रिज़वी; डॉ. शालिनी अली; और इरम ग्रुप के प्रबंध निदेशक ख्वाजा फैज़ शामिल थे.

इस कार्यक्रम में शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्रों की एक विविध भीड़ ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. उल्लेखनीय उपस्थित लोगों में शौकत अली, ठाकुर राजा राय, आलोक चतुर्वेदी, ज़ियारत बाबा मलंग, ताहिर शाह, कारी अबरार जमाल, मज़ारिर खान, पूर्व आईपीएस अधिकारी मंजूर अहमद, पूर्व कुलपति महरुख मिर्ज़ा, सामाजिक कार्यकर्ता सहार बानो और सुन्नी वक्फ बोर्ड की सदस्य सबीहा अहमद शामिल थीं.

मूलभूत आदर्श: राष्ट्र सर्वोपरि

चर्चा का माहौल तैयार करते हुए, मुख्य अतिथि डॉ. इंद्रेश कुमार ने भारत के मार्गदर्शक सिद्धांत को परिभाषित किया. उन्होंने कहा, “राष्ट्र प्रथम, धर्म अंतिम, और मातृभूमि के प्रति प्रेम स्वर्ग की ओर ले जाता है.” उन्होंने इस आदर्श को देश की वास्तविक आत्मा और राष्ट्रीय चरित्र बताया. उन्होंने घृणा, विभाजन और उग्रवाद का प्रचार करने वालों को “समाज और राष्ट्र दोनों का शत्रु” बताते हुए सभी समुदायों से भाईचारा बढ़ाने, संविधान का सम्मान करने और राष्ट्र निर्माण के लिए एकजुट होने का आह्वान किया.

डॉ. कुमार ने आगे चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बांग्लादेश से आने वाले अवैध प्रवासी भारतीय मुसलमानों के अवसरों को प्रभावित कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि जहां भारतीय मुसलमान बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं, वहीं ये प्रवासी नौकरियों, व्यवसायों और फेरी वालों की गाड़ियों पर कब्ज़ा कर रहे हैं. उन्होंने सुझाव दिया कि हज पर जाने वाले भारतीय मुसलमान इस्लामिक देशों में वकालत कर सकते हैं और इस्लामिक सहयोग संगठन के 59 सदस्य देशों से इन प्रवासियों में से कुछ को अपने यहां बसाने की अपील कर सकते हैं. उनका तर्क था कि इससे दबाव कम होगा और भारतीय मुसलमानों को उनके न्यायोचित अवसर प्राप्त करने में मदद मिलेगी.

विकास की ओर सामूहिक यात्रा

उत्तर प्रदेश के राज्य मंत्री दानिश आज़ाद अंसारी ने संगोष्ठी को समय की मांग और आवश्यक बताया. उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘विकसित भारत’ का सपना समावेशी प्रगति पर केंद्रित है जिसमें किसी को पीछे नहीं छोड़ा जाएगा. उन्होंने कहा कि सरकार राष्ट्र को एकजुट करने और आगे बढ़ाने के उद्देश्य से पार्टीगत विभाजन से ऊपर उठकर काम कर रही है. उन्होंने कहा कि विकास के इस लक्ष्य का दायरा विशाल है और उन्होंने डॉ. इंद्रेश कुमार और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच को इस मिशन के समर्थन में देशव्यापी प्रयासों के लिए सराहा. उन्होंने आगे समझाया कि प्रधानमंत्री की विकसित राष्ट्र की अवधारणा में समग्र राष्ट्रीय विकास शामिल है, जो भारत को विश्व की अग्रणी शक्तियों के बराबर खड़ा करेगा – जो प्रत्येक नागरिक के लिए गर्व का विषय है.

अंसारी ने जोर देकर कहा कि यदि प्रत्येक भारतीय अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करे, तो राष्ट्र का विकास स्वतः ही होगा. उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि एक गाँव के शिक्षक का कर्तव्य सीमा पर तैनात सैनिक के कर्तव्य जितना ही महत्वपूर्ण है. इतिहास का स्मरण कराते हुए उन्होंने श्रोताओं को याद दिलाया कि आज़ादी की कीमत असंख्य लोगों के बलिदान से चुकाई गई थी. अंत में, उन्होंने उद्देश्य की एकता का आह्वान करते हुए कहा कि हम सभी को भारतीय होने के नाते एक साथ आगे बढ़ना चाहिए ताकि एक मजबूत, एकजुट और महान भारत का साझा सपना साकार हो सके.

विविधता में एकता: भारत की मूलभूत शक्ति

एनसीएमईआई के कार्यकारी अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. शाहिद अख्तर ने जोर देकर कहा कि 1.4 अरब लोगों के इस देश में विविधता के बीच एकता ही सबसे बड़ी ताकत है. उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा आपसी भाईचारे, सहिष्णुता और बहुलवाद में निवास करती है – ये मूल्य ही देश की विशिष्ट वैश्विक पहचान गढ़ते हैं.

विभाजनकारी विचारधाराओं और ताकतों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए, प्रोफेसर अख्तर ने कहा कि संवाद, समझ और सकारात्मक सहभागिता के माध्यम से ऐसे तत्वों को सही रास्ते पर लाना सामूहिक नैतिक कर्तव्य है. उन्होंने स्पष्ट किया कि एक सामंजस्यपूर्ण समाज का निर्माण केवल कानून और सरकारी कार्रवाई से अधिक की मांग करता है; इसके लिए परिवारों, शैक्षणिक संस्थानों, धार्मिक नेताओं और सामाजिक संगठनों के समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है.

उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि सभी धर्मों के प्रति समान आदर और एक-दूसरे के त्योहारों में भागीदारी राष्ट्रीय एकता की मजबूत नींव है. उन्होंने कहा कि ऐसे साझा उत्सव और परंपराएं आपसी अविश्वास और अलगाव को स्वतः ही कम करने में मदद करती हैं.

विशेष रूप से युवाओं को संबोधित करते हुए, प्रोफेसर अख्तर ने उनसे सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर जिम्मेदार नागरिकों की तरह व्यवहार करने का आग्रह किया. उन्होंने युवाओं को अफवाहों और घृणास्पद सामग्री को अस्वीकार करने और इसके बजाय सद्भाव, शांति और राष्ट्रीय एकता के दूत बनने के लिए प्रोत्साहित किया.

अंत में, उन्होंने कहा कि भारत तभी वास्तविक शक्ति और समृद्धि प्राप्त करेगा जब प्रत्येक नागरिक, धर्म, भाषा या क्षेत्र की परवाह किए बिना, राष्ट्र के भविष्य में स्वयं को समान हिस्सेदार महसूत करेगा. उन्होंने सामूहिक कार्रवाई के माध्यम से “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” के सपने को मूर्त रूप देने का आह्वान किया.

शिक्षा, मूल्य और भविष्य

अपने संबोधन में डॉ. शालिनी अली ने विविधता में एकता को भारत की वास्तविक ताकत बताया. उन्होंने कहा, “हम सब एक हैं. हमारी पूजा-पद्धतियाँ अलग हो सकती हैं, लेकिन हमारा संविधान एक है, और हमारा डीएनए भी एक है. यही भारतीयता की पहचान है.” शिक्षा की आधारभूत भूमिका पर जोर देते हुए, उन्होंने माता-पिता से आग्रह किया कि वे बच्चों में नैतिक मूल्य, देशभक्ति और जिम्मेदार नागरिकता का संचार करें. उन्होंने ऑनलाइन सामग्री को बिना सत्यापित किए साझा करने के खिलाफ भी चेतावनी दी, जिससे समाज में भ्रम और कलह फैलती है.

अंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति राज कुमार मित्तल ने युवाओं की ऊर्जा को शिक्षा, राष्ट्रहित और रोजगार की ओर मोड़ने पर जोर दिया. उन्होंने गरीबी, बेरोजगारी और भेदभाव से मुक्त, सद्भाव की नींव पर बने भारत की परिकल्पना की.

कार्रवाई और आत्मचिंतन का आह्वान

जामिया हमदर्द के रजिस्ट्रार कर्नल ताहिर मुस्तफा ने दोहराया कि “एक समुदाय, एक राष्ट्र — हिंदुस्तान” प्राथमिक राष्ट्रीय उद्देश्य बना रहना चाहिए. डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की विरासत का आह्वान करते हुए, उन्होंने घृणा की शक्तियों के खिलाफ एकजुट सामाजिक मोर्चा बनाकर एक महान और विकसित भारत के मिशन को आगे बढ़ाने का आह्वान किया.

शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्रों की एक बड़ी सभा द्वारा आयोजित यह संगोष्ठी एकीकृत राष्ट्रीय पहचान के पक्ष में एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में उभरी, जिसने “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” के सपने को मूर्त रूप देने के संकल्प को और मजबूत किया.

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-भारत एक्सप्रेस



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