आज जब दुनियाभर में ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों की मांग चरम पर है, तो लाखों विदेशी ग्राहक भारतीय परिधान, हस्तशिल्प, खिलौने और होम डेकोर जैसे उत्पादों को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर ब्राउज़ कर रहे हैं. भारत की समृद्ध हस्तकला, उम्दा गुणवत्ता और आधुनिक डिज़ाइन इन ग्राहकों को आकर्षित करती है. लेकिन इनमें से बड़ी संख्या में ग्राहक खरीदारी पूरी नहीं करते.
इसका मुख्य कारण है– लंबा डिलीवरी समय और महंगा शिपिंग शुल्क. अक्सर अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को ऑर्डर मिलने में 10 से 12 कार्यदिवस लग जाते हैं, जो आज के एक-दिवसीय डिलीवरी के दौर में उन्हें अस्वीकार्य लगता है. खासकर कम मूल्य वाले उत्पादों के लिए, लंबी प्रतीक्षा और ऊंची डिलीवरी फीस खरीद प्रक्रिया में बाधा बनती है, जिससे ग्राहक अक्सर अपना ऑर्डर छोड़ देते हैं.
वहीं चीन और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश तेजी से और सस्ते फुलफिलमेंट विकल्प देकर अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों की अपेक्षाओं पर खरे उतर रहे हैं. जबकि भारत के अधिकांश निर्यातक अब भी सीधे शिपिंग पर निर्भर हैं, जिससे न केवल उनकी लागत बढ़ती है, बल्कि प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने का खतरा भी बना रहता है. वर्ष 2030 तक वैश्विक क्रॉस-बॉर्डर ई-कॉमर्स का बाज़ार लगभग 7.9 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. ऐसे में भारतीय कारोबारियों के लिए डिलीवरी स्पीड अब विलासिता नहीं, बल्कि जरूरत बन गई है.
क्या है इसका समाधान?
इस चुनौती से निपटने के लिए चीन और अन्य देशों ने जो रणनीति अपनाई है, वह है – ओवरसीज वेयरहाउस मॉडल, यानी विदेशी ज़मीन पर अपने उत्पादों का भंडारण. चीन के 60% व्यापारी थर्ड-पार्टी या प्लेटफॉर्म आधारित ओवरसीज वेयरहाउस का उपयोग करते हैं, जिससे वे तेज़ डिलीवरी और सस्ती लागत के साथ बाज़ार में मजबूत पकड़ बना पाए हैं.
असल में, ओवरसीज वेयरहाउस केवल एक गोदाम नहीं बल्कि एक रणनीतिक आधार होता है जो विक्रेता और ग्राहक के बीच की दूरी को कम करता है. इसमें विक्रेता अपने उत्पादों को बड़े पैमाने पर गंतव्य देश के वेयरहाउस में पहले से भेज देते हैं. जब ग्राहक ऑर्डर करता है, तो सामान उसी देश से तुरंत भेजा जाता है, जिससे डिलीवरी में तेजी आती है और लागत भी घटती है.
चीन की सफलता और भारत के लिए चेतावनी
चीन के इसी मॉडल के कारण 2023 में उसका ई-कॉमर्स निर्यात 331 अरब डॉलर तक पहुंच गया. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार, ओवरसीज वेयरहाउस इसका प्रमुख कारण रहा. वहीं रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि यदि भारत इस दिशा में नहीं बढ़ा, तो 2030 तक उसका ई-कॉमर्स निर्यात महज 25 अरब डॉलर ही रहेगा — जो सरकार के लक्ष्य से कहीं कम है.
यूनाइटेड किंगडम में हुई एक रिसर्च के मुताबिक, ओवरसीज वेयरहाउस न केवल ग्राहक संतुष्टि बढ़ाता है बल्कि सप्लाई चेन में देरी और मांग में उतार-चढ़ाव के जोखिम को भी कम करता है. Amazon के FBA (Fulfillment by Amazon) मॉडल से जुड़े कई भारतीय निर्यातकों ने अपनी बिक्री में 12 गुना तक की बढ़ोतरी देखी है.
ओवरसीज वेयरहाउस के लाभ
- तेज़ डिलीवरी: एक या दो दिन में उत्पाद ग्राहक तक पहुंच सकते हैं.
- कम लागत: बल्क शिपमेंट से प्रति यूनिट लॉजिस्टिक खर्च 30% तक कम हो सकता है.
- बेहतर रिटर्न प्रोसेस: विदेशी ग्राहकों को आसान रिटर्न सुविधा मिलती है.
- मांग के अनुसार स्केलेबल सिस्टम: त्योहारों या छुट्टियों में तेजी से ऑर्डर प्रोसेसिंग संभव होती है.
गलतफहमियां जो रोके हुए हैं भारतीय विक्रेताओं को
कई निर्यातक मानते हैं कि ओवरसीज वेयरहाउस बहुत महंगे होते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि स्टोरेज खर्च मात्र 60 से 90 सेंट प्रति घन फुट प्रति माह होता है.
कुछ को लगता है कि विदेशी भंडारण में माल भेजना जोखिम भरा है, लेकिन डेटा दर्शाता है कि इससे बिक्री में जबरदस्त बढ़ोतरी होती है और बल्क शिपमेंट से माल को नुकसान पहुंचने की संभावना भी कम होती है.
कस्टम्स क्लियरेंस को लेकर भी भ्रम है, जबकि सच्चाई यह है कि बल्क ऑर्डर का क्लियरेंस व्यक्तिगत शिपमेंट की तुलना में कहीं ज्यादा किफायती होता है.
सरकार की भूमिका अहम
- भारत में इस मॉडल को अपनाने के लिए सरकारी समर्थन बेहद ज़रूरी है.
- सरकारी-निजी भागीदारी के तहत ओवरसीज वेयरहाउस जोन स्थापित किए जाएं.
- निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं में वेयरहाउस लागत को शामिल किया जाए.
- बड़े पैमाने पर शिपमेंट और कस्टम प्रक्रिया को सरल और तेज़ बनाया जाए.
Amazon Global Selling जैसे प्रोग्राम पहले ही इस मॉडल को अपनाकर भारतीय विक्रेताओं को जोड़ रहे हैं. यदि सरकार भी सही नीतिगत समर्थन दे, तो भारत के छोटे से लेकर बड़े निर्यातक भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा में खड़े हो सकते हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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