Indore News:जय व्यास/मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी इंदौर में गणेश विसर्जन की रात निकलने वाली झिलमिल झांकियों का इतिहास एक सदी पुराना है. कभी कपड़ा मिलों के मजदूरों के सहयोग से शुरू हुई यह परंपरा आज भी जारी है, लेकिन लगातार बढ़ती महंगाई और आर्थिक तंगी के कारण इस बार आयोजकों के सामने परंपरा को जिंदा रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है.
इंदौर में गणेशोत्सव पर निकलने वाली झांकियों को नगर निगम की ओर से 2 लाख रुपये और इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA) की ओर से 3 लाख रुपये (कुल 5 लाख) की सहायता राशि मिलती है. कपड़ा मिलें बंद होने से वर्कशॉप के मुफ्त साधन खत्म हो चुके हैं और हर छोटे काम के लिए भारी खर्च करना पड़ रहा है. ऐसे में 5 लाख रुपये का बजट बेहद कम पड़ रहा है. आयोजकों ने राज्य सरकार से सहायता राशि बढ़ाने की मांग की है ताकि शहर की इस धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए कायम रखा जा सके.
100 साल पुराना गौरवशाली इतिहास और मिल मजदूरों का योगदान
इंदौर में अनंत चतुर्दशी पर गणेश विसर्जन की रात झांकियां निकालने का सिलसिला पिछले करीब 100 वर्षों से चला आ रहा है. एक दौर था जब इंदौर को ‘मिनी मुंबई’ कहा जाता था और यहां की कपड़ा मिलें गुलजार रहती थीं. उस समय मिलों के कर्मचारी अपना एक दिन का वेतन देकर झांकियों के निर्माण में सहयोग करते थे. इतना ही नहीं, मिलों की वर्कशॉप में झांकियों का बहुत सा मैकेनिकल और स्ट्रक्चरल काम मुफ्त में हो जाता था. हालांकि मिलें बंद होने के बावजूद आयोजकों ने इस सिलसिले को थमने नहीं दिया.
महंगाई की मार: 5 लाख का बजट पड़ा छोटा, आयोजकों ने मांगी मदद
वर्तमान में झांकी निर्माताओं की मदद के लिए इंदौर नगर निगम प्रति झांकी 2 लाख रुपये और इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA) 3 लाख रुपये की वार्षिक सहायता देता है. यानी एक झांकी के लिए कुल 5 लाख रुपये मिलते हैं. मालवा मिल गणेशोत्सव समिति के अध्यक्ष कैलाश कुशवाह का कहना है कि आज के दौर में बढ़ती महंगाई और हर काम में लगने वाले भारी-भरकम खर्च के कारण इतने कम बजट में झांकी बनाना बेहद कठिन हो गया है. आयोजकों ने सरकार से वित्तीय सहायता राशि बढ़ाने की गुहार लगाई है.
परंपरा और संस्कृति को बचाना बेहद जरूरी
किसी भी शहर की असली पहचान उसकी जीवंत परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से होती है. इंदौर की विसर्जन झांकियों को देखने न केवल स्थानीय लोग बल्कि आसपास के जिलों से भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. आयोजकों और शहरवासियों का मानना है कि यदि इस ऐतिहासिक संस्कृति को जीवित रखना है और आने वाली पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़कर रखना है, तो सरकार को आगे आकर इन समितियों को मजबूत आर्थिक संबल देना होगा.
-भारत एक्सप्रेस
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