LPG Crisis: ईरान और अमेरिका के बीच एक बार फिर भड़के तनाव ने भारत की रसोई का बजट बिगाड़ने के संकेत दे दिए हैं. इस वैश्विक तनाव के कारण देश में एलपीजी (LPG) का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है. भारत अपनी जरूरत की कुल एलपीजी का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगवाता है, और इसका करीब 90 फीसदी आयात ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ के समुद्री रास्ते से होता है. अगर युद्ध के चलते यह रास्ता प्रभावित हुआ, तो देश में एलपीजी की किल्लत होना तय है.
पहले भी झेलनी पड़ी है लंबी कतारें
इस साल फरवरी में जब दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा था, तो भारत को मार्च से मई के बीच गैस की भारी किल्लत का सामना करना पड़ा था. लोगों को एक-एक सिलेंडर के लिए महीनों इंतजार करना पड़ा था और डिस्ट्रीब्यूटर्स के दफ्तरों पर लंबी लाइनें देखी गई थीं. युद्धविराम के बाद कुछ समय के लिए राहत जरूर मिली थी, लेकिन अब जंग दोबारा शुरू होने से वही पुराना खतरा फिर सिर उठा रहा है. सप्लाई रुकने से न केवल सिलेंडर की डिलीवरी में देरी होगी, बल्कि कीमतों में भी भारी उछाल आ सकता है.
अब क्या करेगी सरकार?
पैट्रोल-डीजल की तरह घरेलू गैस को लेकर भी सरकारी तेल कंपनियां पहले से ही भारी दबाव में हैं. आंकड़ों की मानें तो जून 2026 तक ये कंपनियां हर एक घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर 500 से 700 रुपये तक का घाटा खुद बर्दाश्त कर रही थीं. अब अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस के दाम फिर से बढ़ते हैं, तो सरकार के पास केवल दो ही रास्ते बचेंगे या तो वह बजट से भारी-भरकम सब्सिडी देकर जनता को राहत दे, या फिर सीधे एलपीजी सिलेंडर की कीमतें बढ़ाकर इसका बोझ आम जनता की जेब पर डाल दे.
केवल 9 दिन का बैकअप
इस तरह के संकटों से निपटने के लिए भारत को जल्द से जल्द बड़े ‘रणनीतिक भंडार’ बनाने की जरूरत है. इस समय भारत के पास जो आपातकालीन पेट्रोलियम रिजर्व है, उससे देश की जरूरत सिर्फ 9.5 दिनों के लिए पूरी हो सकती है. जबकि इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) की सलाह है कि किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए कम से कम 90 दिनों का बैकअप स्टॉक होना बेहद जरूरी है.
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-भारत एक्सप्रेस
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