पीएम मोदी सुभाषितम
PM Modi Subhashitam: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक संस्कृत श्लोक साझा करते हुए लोगों को अपनी वाणी को लेकर महत्वपूर्ण संदेश दिया. उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय के 15वें श्लोक के जरिए बताया कि इंसान के शब्दों में किसी को दुख पहुंचाने की ताकत भी होती है और रिश्तों में मिठास घोलने की क्षमता भी.
प्रधानमंत्री ने जो श्लोक साझा किया, वह है “अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्. स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥”. इसका सीधा अर्थ है कि व्यक्ति को ऐसी बात कहनी चाहिए जो सच हो, सुनने में अच्छी लगे, सामने वाले के लिए हितकारी हो और उसके मन में बेचैनी या दुख पैदा न करे.
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥ pic.twitter.com/5oVLLlRB73
— Narendra Modi (@narendramodi) September 24, 2026
वाणी को बताया गया तप
गीता के इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने ‘वाङ्मय तप’ यानी वाणी की तपस्या का उल्लेख किया है. इसका मतलब केवल मीठा बोलना नहीं है, बल्कि सच और कल्याणकारी बात को ऐसे तरीके से कहना है जिससे किसी दूसरे व्यक्ति को अनावश्यक मानसिक कष्ट न पहुंचे.
श्लोक में वेदों और शास्त्रों के नियमित अध्ययन तथा स्वाध्याय को भी वाणी की तपस्या का हिस्सा बताया गया है. यानी अच्छी वाणी सिर्फ शब्दों के चयन से नहीं आती, बल्कि अच्छे विचार और ज्ञान भी उसके पीछे जरूरी हैं.
शब्दों का असर बड़ा होता है
प्रधानमंत्री की ओर से साझा किए गए संदेश का भाव यही है कि बोलने से पहले थोड़ा ठहरकर सोचना जरूरी है. कई बार गुस्से या जल्दबाजी में कही गई एक बात रिश्तों में दूरी पैदा कर सकती है, जबकि सही समय पर बोले गए कुछ अच्छे शब्द किसी का मन भी बदल सकते हैं.
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संदेश में इस बात पर जोर दिया गया है कि वाणी का इस्तेमाल अहंकार या किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि सत्य, प्रेम और हित की भावना के साथ किया जाना चाहिए. विचारपूर्वक बोली गई वाणी न केवल व्यक्तिगत संबंधों को बेहतर बनाती है, बल्कि समाज में शांति, सद्भाव और सकारात्मक माहौल बनाने में भी योगदान दे सकती है.
-भारत एक्सप्रेस
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