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त्रिपुरा में पीएम मोदी की ‘अध्यात्म क्रांति’, त्रिपुर सुंदरी मंदिर के पुनर्विकास से कैसे बदलेगी प्रदेश की किस्मत?

PM Modi In Tripura Sundari Temple: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवरात्र के पहले दिन त्रिपुर सुंदरी मंदिर विकास कार्यों का लोकार्पण किया किया है. इसी के साथ त्रिपुरा की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत में एक नया अध्याय जुड़ गया है.

PM Modi Tripura Sundari Temple Tripura

PM Modi In Tripur Sundari Temple: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर पर्यटन को विरासत और विकास के बीच एक सेतु के रूप में वर्णित करते रहे हैं और उनकी नजर में भारत के विकास में आध्यात्मिक पर्यटन का विशेष स्थान है. उनके इस विजन के तहत त्रिपुर सुंदरी मंदिर का पुनर्विकास पूर्वोत्तर के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है, जिसने त्रिपुरा को भारत के आध्यात्मिक पर्यटन मानचित्र पर मजबूती से स्थापित कर दिया है. आज नवरात्रि के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रसाद योजना के अंतर्गत माता त्रिपुर सुंदरी मंदिर के विकास कार्यों का लोकार्पण किया. इसी के साथ त्रिपुरा की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत में एक नया अध्याय जुड़ गया है.

अरुणाचल प्रदेश पहुंचने पर बड़ी संख्या में लोगों ने पीएम का स्वागत किया. प्रधानमंत्री ने पूजा-अर्चना की और मंदिर में लगी प्रदर्शनी का भी अवलोकन किया. यह प्रदर्शनी मंदिर के समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को दर्शाती है. इस अवसर पर जमातिया होदा समुदाय के कलाकारों ने भक्ति गीतों के साथ प्रधानमंत्री का स्वागत किया.

पीएम मोदी के विजन के अनुसार विकास

51 शक्तिपीठों में से एक त्रिपुर सुंदरी मंदिर को प्रधानमंत्री मोदी के विजन के तहत खूबसूरती से रूपांतरित किया गया है. इसमें सदियों पुरानी विरासत को आधुनिक सुविधाओं के साथ समाहित किया गया है. पुनर्विकास में विशाल लॉबी, दुकानें, बहुउद्देश्यीय हॉल, पुजारियों और स्वयंसेवकों के लिए समर्पित स्थान, बेहतर पहुंच और उन्नत भीड़ प्रबंधन प्रणालियां शामिल हैं. मंदिर के प्रसिद्ध जीआई-टैग वाले पेड़े और उन्नत सुविधाओं के साथ, भक्त और पर्यटक अब पहले से कहीं अधिक आस्था, संस्कृति और आधुनिक सुविधाओं का अनुभव कर सकते हैं.

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त्रिपुर सुंदरी मंदिर का इतिहास (Tripura Sundari Temple history)

माता त्रिपुर सुंदरी मंदिर, त्रिपुरा के गोमती जिले के उदयपुर कस्बे में स्थित 51 शक्तिपीठों में से एक है. स्थानीय लोगों के बीच इसे त्रिपुरेश्वरी मंदिर या माता बाड़ी के नाम से भी जाना जाता है. किंवदंती है कि यह मंदिर वह स्थान है, जहां देवी सती के दाहिने पैर का एक भाग गिरा था. श्री विद्या परंपरा में मां त्रिपुर सुंदरी, जिन्हें षोडशी और ललिता भी कहा जाता है, को सर्वोच्च देवी और तीनों लोकों में सबसे सुंदर के रूप में पूजा जाता है.

इस मंदिर का निर्माण महाराजा धन्य माणिक्य ने वर्ष 1501 ई. में कराया था. ऐसा माना जाता है कि 15वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में त्रिपुरा पर शासन करने वाले राजा को एक रात स्वप्न में देवी त्रिपुरेश्वरी ने दर्शन दिए और उन्हें राज्य की तत्कालीन राजधानी उदयपुर के निकट एक पहाड़ी की चोटी पर अपनी पूजा आरंभ करने का निर्देश दिया.

बाद में बार-बार इसी प्रकार के स्वप्न आने पर महाराजा ने मंदिर में त्रिपुर सुंदरी की मूर्ति स्थापित की. यह ऐतिहासिक मंदिर एक अनूठी आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है, जो हिंदू धर्म के वैष्णव और शाक्त संप्रदायों को जोड़ता है और विविधता में एकता का प्रतीक है.

त्रिपुरसुंदरी रूप में होती है माता की पूजा (Tripura Sundari Shakti Peeth)

देवी शक्ति की पूजा मां त्रिपुर सुंदरी के रूप में की जाती है और उनके साथ स्थित भैरव को त्रिपुरेश कहा जाता है. मंदिर में चौकोर आकार का गर्भगृह है, जिसे विशिष्ट बंगाली एक-रत्न शैली में डिजाइन किया गया है, जो एक छोटी पहाड़ी पर स्थापित है, जो कछुए (कूर्म) के कूबड़ जैसा दिखता है, जिससे इसे कूर्म पीठ का नाम मिला है.

मूर्ति के पैरों के नीचे एक श्री यंत्र उत्कीर्ण है. यह श्री यंत्र कोई साधारण डिजाइन नहीं है, बल्कि एक रहस्यमय ज्यामितीय मंडल है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड व पुरुष और स्त्री ऊर्जाओं के दिव्य मिलन का प्रतीक माना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि इस श्री यंत्र के दर्शन या पूजा कई शुभ अनुष्ठान करने के बराबर है, जो भक्तों को आध्यात्मिक और भौतिक आशीर्वाद प्रदान करता है.

5 फीट ऊंची बड़ी और प्रमुख मूर्ति देवी त्रिपुर सुंदरी की है. एक छोटी मूर्ति है, जिसे ‘छोटो-मां’ या देवी चंडी के नाम से जाना जाता है. कहा जाता है कि छोटी मूर्ति को त्रिपुरा के राजा युद्ध के मैदान और शिकार अभियानों में ले जाते थे. लोक कथाओं के अनुसार, देवी की वर्तमान मूर्ति वास्तव में माताबाड़ी के पास ‘ब्रह्मछारा’ के जल में डूबी हुई पाई गई थी. स्थानीय परंपराओं में देवी को अर्पित किए जाने वाले लाल गुड़हल के फूल को बहुत सम्मान दिया जाता है और आम प्रसाद में पेड़ा मिठाई शामिल है.

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भगवान विष्णु भी होती है पूजा

यहां भगवान विष्णु की पूजा ‘शालग्राम शिला’ या काले रंग की शिला के रूप में की जाती है. काली मंदिर या किसी शक्तिपीठ में शक्ति देवी के साथ विष्णु की पूजा का ऐसा उदाहरण न सिर्फ दुर्लभ है, बल्कि इस मंदिर की एक अनूठी विशेषता भी है. यह शिव और शक्ति के मिलन का एक दिव्य स्थल भी है, जो विश्व में कहीं और नहीं मिलता.

मंदिर के प्रसाद को मिला है  GI टैग (Tripura Sundari Temple GI tag)

हर साल देशभर से लाखों भक्त दीपावली मेले के लिए यहां एकत्रित होते हैं. दो दिवसीय मेला एक आधिकारिक आयोजन है. देश भर से भागीदारी के साथ माताबाड़ी में दीपावली मेला सिर्फ एक मेला ही नहीं है, बल्कि त्रिपुरा के बहु-सांस्कृतिक ताने-बाने का चित्रण भी है. हाल ही में मंदिर में प्रसाद के रूप में चढ़ाए जाने वाले माताबाड़ी पेड़ा को प्रतिष्ठित भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग प्रदान किया गया है.

 जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण कार्य (Tripura Sundari Mandir Beautification Work)

मंदिर परिसर के जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण के लिए प्रसाद योजना के अंतर्गत एक प्रमुख परियोजना शुरू की गई. इस परियोजना में मंदिर परिसर में सुधार, संगमरमर का फर्श और नए रास्ते, पुनर्निर्मित प्रवेश द्वार और बाड़, उचित जल निकासी, पेड़ा स्टॉल, ध्यान कक्ष, अतिथि आवास, कार्यालय कक्ष, पेयजल जैसी सुविधाओं से युक्त एक नया तीन मंजिला परिसर शामिल है.

यह पुनर्विकास सिर्फ एक मंदिर के बारे में नहीं है, बल्कि उदयपुर को एक धार्मिक-पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित करने के बारे में है. त्रिपुरा सरकार का लक्ष्य त्रिपुरा सुंदरी मंदिर को आध्यात्मिक पर्यटन का केंद्र बनाना है, जो होटल, परिवहन, हस्तशिल्प बिक्री और स्थानीय खाद्य व्यवसायों को भी बढ़ावा देगा. इससे हर साल लाखों अतिरिक्त पर्यटकों के आने का अनुमान है, जिससे जिले की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा.

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बांग्लादेश से भी आते हैं भक्त

देश भर और पड़ोसी देश बांग्लादेश से 12-15 लाख से अधिक लोग मंदिर में आते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं. यह परियोजना तीर्थयात्रियों और आने वाले पर्यटकों के हित में बुनियादी ढांचे की कमी को पूरा करती है. माता त्रिपुरा सुंदरी मंदिर में कछुए की पूजा एक पवित्र पशु के रूप में की जाती है. मंदिर का पूरा डिजाइन कछुए के आकार का है.

भारत सरकार ने 2021 में प्रसाद योजना के तहत ‘माता त्रिपुरा सुंदरी मंदिर परिसर के विकास’ परियोजना को मंजूरी दी. बाद में परियोजना में कुछ संशोधन किए गए. इस परियोजना की लागत 54.04 करोड़ रुपए है, जिसका वित्तपोषण केंद्र सरकार की प्रसाद योजना (34.43 करोड़ रुपए) और राज्य योजना (17.61 करोड़ रुपए) के तहत किया गया है.

मंदिर से मिल रही अर्थव्यवस्था को मजबूती (Tripura Sundari Mandir Development)

वर्तमान में माताबाड़ी में हर दिन लगभग तीन से साढ़े तीन हजार तीर्थयात्री आते हैं. उम्मीद है कि परियोजना पूरी होने के बाद, दैनिक आगमन दोगुना होकर लगभग 5,000-7,000 व्यक्तियों तक पहुंच जाएगा. यह परियोजना स्थानीय समुदायों, होटलों, गाइडों, टैक्सी मालिकों और अन्य हितधारकों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्रदान करेगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहले और विकास के सपने से यह मंदिर अब और भी अधिक इलाके का विकास करने वाला है.



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