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आजादी के नायक चंद्रशेखर आजाद की जयंती पर पीएम मोदी ने किया नमन, बोले- अद्वितीय वीरता और साहस के प्रतीक थे

चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) न सिर्फ एक क्रांतिकारी थे, बल्कि एक प्रेरक व्यक्तित्व भी थे. उन्होंने युवाओं को संगठित किया और उनमें स्वतंत्रता के लिए लड़ने का जज्बा दिया.

Vaishno Devi Landslide

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन नायकों में से एक हैं, जिनका नाम सुनते ही देशभक्ति और बलिदान की भावना जागृत हो जाती है. 23 जुलाई 1906 को उनका जन्म मध्य प्रदेश के भाबरा गांव हुआ था. आज पूरा देश उनकी जन्म जयंती के मौके पर उन्हें याद कर श्रद्धांजलि दे रहा है. इसी कड़ी में पीएम मोदी ने भी शहीद चंद्रशेखर को नमन किया.

Chandra Shekhar Azad को पीएम ने दी श्रद्धांजलि

पीएम मोदी ने एक्स पर एक पोस्ट शेयर कर शहीद चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) को श्रद्धांजलि अर्पित की. पीएम मोदी ने लिखा- चंद्रशेखर आज़ाद को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि. वे अद्वितीय वीरता और साहस के प्रतीक थे. भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति में उनकी भूमिका अत्यंत मूल्यवान है और हमारे युवाओं को साहस और दृढ़ विश्वास के साथ न्याय के पक्ष में खड़े होने के लिए प्रेरित करती है.

Chandra Shekhar Azad की कहानियां प्रेरणा देती हैं

शहीद चंद्रशेखर आजाद की वीरता, निडरता और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत की कहानियां आज भी प्रेरणा देती हैं. चंद्रशेखर का बचपन साधारण था, लेकिन उनके मन में देशभक्ति की भावना बचपन से ही थी. 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उनके जीवन को नई दिशा दी. मात्र 13 वर्ष की आयु में उन्होंने असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और पहली बार गिरफ्तारी का सामना किया. जब मजिस्ट्रेट ने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने गर्व से जवाब दिया, ‘आजाद’. यहीं से उन्हें ‘आजाद’ नाम मिला, जो उनकी पहचान बन गई.

चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ सशस्त्र क्रांति की शुरुआत की. 1925 में काकोरी कांड में उनकी भागीदारी ने उन्हें अंग्रेजों की नजरों में कुख्यात बना दिया. इस घटना में क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाने को लूटकर हथियार खरीदने के लिए धन जुटाया था. यह कांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ.

अंग्रेजों के हाथ नहीं आए, खुद को मारी गोली

चंद्रशेखर आजाद की सबसे बड़ी खासियत थी उनकी निडरता. वह हमेशा कहा करते थे, “दुश्मन की गोली के सामने मैं कभी नहीं झुकूंगा.” उनकी यह बात 1931 में अल्फ्रेड पार्क (इलाहाबाद) में उनके अंतिम क्षणों में सत्य साबित हुई. 27 फरवरी 1931 को अंग्रेजी पुलिस ने उन्हें घेर लिया, लेकिन आजाद ने हार नहीं मानी. उन्होंने अपनी आखिरी गोली तक लड़ाई लड़ी और अंत में अपनी ही पिस्तौल से गोली मारकर शहादत दी, ताकि जीवित पकड़े न जाएं. यह घटना आज भी भारतीय इतिहास में स्वतंत्रता के लिए उनके अटल संकल्प का प्रतीक है.

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चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) न सिर्फ एक क्रांतिकारी थे, बल्कि एक प्रेरक व्यक्तित्व भी थे. उन्होंने युवाओं को संगठित किया और उनमें स्वतंत्रता के लिए लड़ने का जज्बा दिया. उनकी सादगी, अनुशासन और देश के प्रति समर्पण आज भी युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा है.

उनका मानना था कि स्वतंत्रता केवल मांगने से नहीं मिलती, उसे छीननी पड़ती है. उनकी यह विचारधारा आज भी हमें आत्मनिर्भरता और साहस का पाठ पढ़ाती है. आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, चंद्रशेखर आजाद जैसे वीरों का बलिदान हमें याद दिलाता है कि आजादी की कीमत कितनी बड़ी थी. उनकी कहानी सिर्फ इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं है, यह हर भारतीय के दिल में देशभक्ति की आग जलाने वाली एक अनमोल धरोहर है.

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-भारत एक्सप्रेस



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