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राहुल गांधी का पुतिन से मिलने का सपना टूटा, थरूर को न्‍यौता गया; कांग्रेस के आरोपों पर बीजेपी ने गिनाई पुरानी गलतियां

राहुल गांधी ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन से मिलने की इच्छा जताई, लेकिन समय न मिलने पर कांग्रेस ने प्रोटोकॉल तोड़े जाने का आरोप लगाया. बीजेपी ने पलटवार किया- राहुल ने खुद राष्ट्रपति भोज से बहिष्कार किया था.

putin rahul gandhi

Putin India Visit: आज रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत में हैं. उनका यह दौरा भारत-रूस दोस्ती को मजबूत करने के लिए है. लेकिन इस बीच एक नई सियासी बहस शुरू हो गई. विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पुतिन से मिलने की इच्छा जताई. वे कहते हैं कि लोकसभा में विपक्ष के नेता के तौर पर उन्हें समय मिलना चाहिए था.

कांग्रेस पार्टी ने कहा कि राष्ट्रपति भवन में होने वाले भोज में भी उन्हें न्योता नहीं दिया गया. यह प्रोटोकॉल का उल्लंघन है. राहुल की यह शिकायत सोशल मीडिया पर वायरल हो गई. एक तस्वीर में पुतिन को प्लेन से उतरते दिखाया गया, तो राहुल को भीड़ में घूमते हुए. लोग पूछ रहे हैं- क्या यह सही है?

कांग्रेस का प्रोटोकॉल रोना

कांग्रेस नेता पत्रकारों से रोते नजर आए. वे कहते हैं कि पुतिन जैसे मेहमान से मिलना विपक्ष का हक है. राष्ट्रपति भवन का भोज राष्ट्रीय कार्यक्रम है, जहां सभी पार्टियों को बुलाना चाहिए. राहुल गांधी ने कहा कि यह लोकतंत्र की गरिमा का सवाल है. पार्टी का कहना है कि सरकार विपक्ष को दबा रही है. सोशल मीडिया पर #RahulMeetsPutin जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे. लेकिन सवाल यह है- क्या राहुल खुद प्रोटोकॉल का पालन करते हैं? बीजेपी ने इसी पर तीखा हमला बोला.

बीजेपी का पलटवार: राहुल के पुराने बहिष्कार

राइट विंग के एक ट्विटर अकाउंट @PoliticalKida ने एक लंबा थ्रेड शेयर किया. इसमें कहा गया कि राहुल गांधी खुद राष्ट्रीय आयोजनों से दूर रहते हैं. गणतंत्र दिवस पर वे नहीं आए. स्वतंत्रता दिवस पर भी अनुपस्थित रहे. राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद के शपथग्रहण पर बधाई तक नहीं दी. वीपी जगदीप धनखड़ के शपथ पर भी गैरहाजिर. चीफ जस्टिस संजीव खन्ना और सूर्य कांत के शपथग्रहण से भी दूर रहे. कर्तव्य भवन के उद्घाटन पर नहीं पहुंचे. पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न मिलने पर भी अनुपस्थित. दलील यह है- अगर राहुल खुद संवैधानिक पदों का सम्मान नहीं करते, तो शिकायत का क्या हक?

इस थ्रेड में कई तस्वीरें और वीडियो हैं, जो इन घटनाओं को दिखाते हैं. बीजेपी कहती है- सम्मान कमाना पड़ता है, मांगना नहीं.

क्या कहते हैं राजनीतिक विशेषज्ञ?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बहस चुनावी रंग ले सकती है. पुतिन का दौरा आर्थिक समझौतों पर केंद्रित है, लेकिन घरेलू सियासत हावी हो गई. राहुल की अनुपस्थितियों को बीजेपी बार-बार उठाती है. विपक्ष का कहना है कि यह पुरानी बातें हैं, अब बदलाव हो रहा है. लेकिन आम लोग सोच रहे हैं- क्या नेता राष्ट्र पहले रखें या अपनी कुर्सी? यह विवाद जल्द शांत होगा या लंबा चलेगा, देखना बाकी है. कुल मिलाकर, पुतिन का दौरा भारत की एकता का प्रतीक है, लेकिन सियासत ने इसे रंग दे दिया.

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