Narendra Modi Rakhi -bharat express
Narendra Modi Rakhi: रक्षाबंधन के त्योहार में अब सिर्फ दो दिन बाकी हैं और पूरे देश में इसकी तैयारियां जोर पकड़ चुकी हैं. भाई-बहन के प्यार और विश्वास का यह त्योहार समय के साथ सिर्फ पारिवारिक रस्म तक सीमित नहीं रहा. पश्चिम बंगाल में तो रक्षाबंधन का सामाजिक और राजनीतिक रंग भी लगातार गहरा होता दिखाई दे रहा है. इस बार कोलकाता के बड़े राखी बाजार में ‘नरेंद्र मोदी राखी’ और भगवा डिजाइन वाली राखियों की मांग चर्चा का विषय बनी हुई है.
बड़ा बाजार में राखियों की खरीदारी तेज
कोलकाता का बड़ा बाजार राखियों के प्रमुख थोक बाजारों में गिना जाता है. त्योहार से पहले यहां खरीदारों की भीड़ बढ़ने लगी है. शहर के अलग-अलग इलाकों के व्यापारी यहां से थोक में राखियां खरीदकर ले जा रहे हैं. हावड़ा और बड़ा बाजार का जायजा लेने पर इस बार राखियों के डिजाइन और मांग में भी बदलाव देखने को मिला. व्यापारियों के एक वर्ग के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर या नाम वाली राखियों की मांग इस बार काफी ज्यादा है. इसके साथ ही भगवा रंग, तिलक और अन्य धार्मिक-सांस्कृतिक डिजाइनों वाली राखियां भी ग्राहकों को आकर्षित कर रही हैं.
राखी में दिख रहा राजनीतिक रंग
पश्चिम बंगाल में रक्षाबंधन का त्योहार पहले से ही सामाजिक महत्व रखता है. तृणमूल कांग्रेस की सरकार के दौरान भी इस मौके पर कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं. सत्ता परिवर्तन के बाद भाजपा की ओर से भी रक्षाबंधन को लेकर कार्यक्रमों और आयोजनों को महत्व दिया जा रहा है. इसी वजह से इस बार बाजार में राजनीतिक चेहरों और प्रतीकों वाली राखियां लोगों का ध्यान खींच रही हैं. हालांकि, ‘नरेंद्र मोदी राखी’ की बढ़ी मांग को लेकर व्यापारियों की अपनी-अपनी राय है और इसे सीधे तौर पर किसी राजनीतिक रुझान का प्रमाण नहीं माना जा सकता.
रवींद्रनाथ ठाकुर से भी जुड़ा है इतिहास
बंगाल में रक्षाबंधन का महत्व केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं है. 1905 के बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन के दौरान रवींद्रनाथ ठाकुर ने राखी बंधन को सामाजिक एकता और भाईचारे के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया था. उस दौर में लोगों के बीच एकता और आपसी मेल-मिलाप का संदेश देने के लिए राखी बांधी गई थी. यही वजह है कि बंगाल में राखी का त्योहार सामाजिक एकजुटता की भावना से भी जुड़ा हुआ माना जाता है.
बढ़ी मांग, लेकिन राखी बनाने वालों की कमी
बाजार में मांग बढ़ने के बावजूद राखी कारोबारियों के सामने एक नई चुनौती भी है—श्रमिकों की कमी. एक राखी विक्रेता के मुताबिक, पहले बड़ी संख्या में महिलाएं घर या छोटे कारखानों में राखियां तैयार करती थीं. दिनभर काम करके उन्हें करीब 100 रुपये तक की मजदूरी मिलती थी. विक्रेता का दावा है कि राज्य सरकार की महिलाओं को मिलने वाली 3,000 रुपये की मासिक आर्थिक सहायता के कारण अब कई महिलाएं राखी बनाने के काम में कम रुचि दिखा रही हैं. हालांकि, यह व्यापारियों का दावा है और इसके स्वतंत्र आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं.
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कारोबार को लेकर व्यापारियों की अलग-अलग राय
राखी बाजार में कारोबार को लेकर भी एक जैसी तस्वीर नहीं है. कुछ दुकानदारों का कहना है कि इस साल मांग अच्छी है और बिक्री में तेजी देखने को मिल रही है. वहीं, कुछ व्यापारियों के मुताबिक बाजार अभी उनकी उम्मीद के मुताबिक नहीं चला है. फिलहाल इतना जरूर है कि रक्षाबंधन की तैयारियों के बीच कोलकाता के बाजार में राखियों की रंग-बिरंगी दुनिया के साथ राजनीति का रंग भी नजर आ रहा है. खास तौर पर ‘नरेंद्र मोदी राखी’ की मांग ने इस त्योहार को लेकर बाजार की तस्वीर को और दिलचस्प बना दिया है.
भारत एक्सप्रेस
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