Sarguja Viral Video: सरगुजा/दिनेश गुप्ता: जब राजधानी के वातानुकूलित कमरों में बैठे हुक्मरान ‘सुशासन तिहार’ का फीता काट रहे होते हैं और ‘डिजिटल और ऑनलाइन’ क्रांति के कसीदे पढ़े जा रहे होते हैं, ठीक उसी वक्त देश की व्यवस्था को दो ऐसी तस्वीरें आईना दिखाती हैं जो कलेजा चीर देती हैं. पहली तस्वीर छत्तीसगढ़ के सरगुजा से है, जहां एक लाचार बहू अपनी 90 साल की बुजुर्ग सास को पीठ पर लादकर, उबड़-खाबड़ रास्तों और नदी-नालों को पार करते हुए 9 किलोमीटर पैदल बैंक ले जाने पर मजबूर है.
इसकी चर्चा और अधिक इसलिए भी हो रही है कि कुछ समय पहले ओडिशा से इसी प्रकार का मामला सामने आया था. ओडिशा के क्योंझर जिले में देखने को मिली थी. जहां, बेबस आदिवासी भाई को अपनी मृत बहन के खाते से पैसे निकालने के लिए उसका कंकाल कंधे पर लादकर बैंक पहुंचना पड़ा था. यह कोई सामान्य खबरें नहीं हैं, यह इस देश के ‘अंगूठे और फिंगरप्रिंट’ वाले उस डिजिटल तानाशाही पर एक क्रूर व्यंग्य है, जो जिंदा इंसानों से उनकी जिंदगी और मुर्दों से उनका कफन तक छीन लेती है.
फिंगरप्रिंट का वो जादुई खेल…(Sushasan Tihar In Sarguja)
छत्तीसगढ़ के मैनपाट के कुनिया गांव की सुखमनिया जब रोते हुए अपनी दास्तां सुनाती है, तो पत्थरों का भी दिल पसीज जाए. 3 महीने की पेंशन यानी कुल जमा 1500 रुपये. इस मामूली रकम के लिए 90 साल की बुजुर्ग सोनवारी को भीषण गर्मी में पथरीले रास्तों से गुजरना पड़ा. गुनाह सिर्फ इतना था कि बैंक को ‘भौतिक सत्यापन’ (Physical Verification) चाहिए था और दादी मां के उम्रदराज हाथों की लकीरें मिट चुकी थीं, जिससे मशीन में उनका ‘फिंगरप्रिंट’ मैच नहीं हो रहा था.
A tribal woman from Chhattisgarh’s Surguja carried her 90 year old mother-in-law on her shoulders and walked 5 km in the scorching heat to avail her pension money. pic.twitter.com/5s69FbMEgt
— खुरपेंची ढांचे (@Khurpenchinfra) May 23, 2026
इधर छत्तीसगढ़ में जिंदा इंसान का अंगूठा मशीन से मैच नहीं हो रहा था, तो उधर ओडिशा के क्योंझर में बैंक के कड़े नियम मृत बहन के पैसे देने को तैयार नहीं थे. वहां एक बेबस आदिवासी भाई को अपनी ही बहन के कंकाल को कंधे पर उठाकर बैंक की चौखट तक लाना पड़ा ताकि वो साबित कर सके कि उसकी बहन अब इस दुनिया में नहीं है और उसे पैसों की सख्त जरूरत है.
ऑनलाइन कूटनीति बनाम जमीनी असुविधा (Sarguja Bank Fingerprint Issue)
छत्तीसगढ़ के पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस देव सिंह ने इस प्रशासनिक क्रूरता पर बिल्कुल सही चोट की है. उन्होंने कहा कि प्रशासन में होड़ मची है कि सब कुछ ऑनलाइन कर दो, लेकिन ऑनलाइन सुविधा के लिए होता है, नागरिकों की असुविधा बढ़ाने के लिए नहीं. जब चुनाव होते हैं, तो चुनाव आयोग घर-घर जाकर वोट कलेक्ट करने की योजनाएं बनाता है. लेकिन जब उसी असहाय बुजुर्ग को उसकी जीवनदायिनी पेंशन देनी हो, तब बैंक मित्र घर जाना बंद कर देते हैं.
सुशासन के उत्सव में सिसकता सामाजिक ढांचा
सरकारी फाइलों में दर्ज ‘सुशासन’ का यह त्योहार देश के आदिवासियों और ग्रामीणों के लिए एक त्रासदी से कम नहीं है. यह घटना हमारे सामाजिक ताने-बाने को झकझोरती है कि एक बहू अपनी सास के लिए इतनी वफादार है कि उसे पीठ पर उठा लेती है, एक भाई अपनी बहन के लिए कंकाल तक कंधे पर रख लेता है. यानी समाज में ‘इमोशन और जिम्मेदारी’ आज भी जिंदा है, लेकिन अगर कुछ मर चुका है, तो वह है हमारा सरकारी सिस्टम. इस सिस्टम को अब संवेदनाओं के ‘सत्यापन’ की सख्त जरूरत है, वरना डिजिटल इंडिया की चमक के पीछे ऐसे ही कड़वे सच देश को शर्मसार करते रहेंगे.
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