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झांसी की रानी की तस्वीर ढूंढता था वो बच्चा, बड़ा होकर बन गया ब्रिटिश हुकूमत का काल, पढ़ें पूरी कहानी

Shaheed Sukhdev Jayanti: शहीद सुखदेव का जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी गाथा है. भगत सिंह और राजगुरु के साथ उन्होंने फांसी का सामना किया. बचपन से क्रांति की राह चुनी और असेंबली बम कांड में अहम भूमिका निभाई. पढ़ें सुखदेव की पूरी कहानी.

Shaheed Sukhdev Jayanti: भारत की स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी धारा में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का नाम अमर है. भगत सिंह की वीरता जितनी याद की जाती है, उतना ही बड़ा योगदान सुखदेव का भी रहा. वे भगत सिंह के सबसे करीबी साथी थे और क्रांति के रास्ते पर उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चले.

बचपन और परवरिश

15 मई 1907 को जन्मे सुखदेव ने मात्र तीन साल की उम्र में पिता को खो दिया. मां और ताऊ ने उनका पालन-पोषण किया. ताऊ गांधीजी के अनुयायी थे और अहिंसक आंदोलन में विश्वास रखते थे लेकिन सुखदेव ने क्रांतिकारी मार्ग चुना. बचपन से ही उनके मन में मातृभूमि के लिए बलिदान का संकल्प था.

झांसी की रानी से प्रेरणा

सुखदेव बचपन में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की तस्वीर ढूंढते रहते थे. जब भी तस्वीर मिल जाती वे गर्व से मां को दिखाते और कहते कि वे भी ऐसे ही वीर बनेंगे. इस बचपन की चाह ने उनके जीवन को क्रांतिकारी दिशा दी.

शिक्षा और क्रांतिकारी जुड़ाव

हाईस्कूल के बाद वे लाहौर पहुंचे और नेशनल कॉलेज में दाखिला लिया. यहां उनकी मुलाकात भगत सिंह से हुई. दोनों ने मिलकर क्रांतिकारी दल में सक्रिय भूमिका निभाई. घर पर उनके सामान में पिस्तौल और कारतूस मिलने से परिवार को भी समझ आ गया कि वे अब पूरी तरह क्रांति के रास्ते पर हैं.

पढ़ाई और विचारधारा

सुखदेव बेहद पढ़ाकू थे. उनकी आलमारी में विश्वक्रांति, राजनीति और इतिहास की किताबें भरी रहतीं. वे फ्रांस, इटली और रूस की क्रांतियों का अध्ययन करते और साथियों से चर्चा करते. भगत सिंह के साथ वे अराजकतावाद और समाजवाद पर गहन बहस करते.

अदालत का फैसला

सांडर्स वध केस में अदालत ने सुखदेव को भगत सिंह जितना ही दोषी माना. उन्हें मौत की सजा सुनाई गई. अदालत ने लिखा कि उनका अपराध किसी भी तरह भगत सिंह से कम नहीं है.

असेंबली बम कांड में भूमिका

1929 के असेंबली बम कांड में भगत सिंह को शामिल कराने में सुखदेव की निर्णायक भूमिका रही. वे मानते थे कि भगत सिंह ही जनता के सामने क्रांतिकारी विचारों को मजबूती से रख सकते हैं.

जेल में बेफिक्र सुखदेव

लाहौर षडयंत्र केस में वे बचाव में बिल्कुल उदासीन रहे. अदालत में वे अक्सर किताबों में डूबे रहते और गवाहों की गवाही पर मुस्कुराते. उन्हें पता था कि फांसी तय है, लेकिन वे निडर और प्रसन्नचित बने रहे.

अंतिम क्षण

23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई. छोटे भाई मथरादास ने लिखा कि वे आखिरी मुलाकात में भी हंसते हुए बातें कर रहे थे. उनके लिए फांसी का फंदा मानो खेल था.

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सुखदेव का जीवन बलिदान, साहस और विचारों की गहराई का प्रतीक है. वे भगत सिंह के सबसे करीबी साथी थे और क्रांति के मार्ग पर उनके साथ अंतिम सांस तक डटे रहे. आजादी की लड़ाई में उनका योगदान उतना ही महान है जितना भगत सिंह और राजगुरु का.

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-भारत एक्सप्रेस



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