लोकपाल द्वारा एक सिटिंग जज के खिलाफ शिकायत पर विचार करने के मामले में लिए एक स्वतः संज्ञान पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने लोकपाल के रजिस्ट्रार और शिकायतकर्ता को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस अभय एस ओका की पीठ ने लोकपाल के आदेश पर रोक लगा दिया है. कोर्ट 18 मार्च को इस मामले में अगली सुनवाई करेगा.
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि यह मामला बहुत परेशान करने वाला है. कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़ा यह बहुत महत्वपूर्ण मामला है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हाई कोर्ट जज कभी भी लोकपाल के दायरे में नहीं आएंगे. कोर्ट ने शिकायतकर्ता की पहचान को गोपनीय रखने का आदेश दिया है. वही सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि असाधारण रूप से यह खतरे से भरा है.
न्यायाधीश के खिलाफ की गई शिकायत
लोकपाल ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि हाई कोर्ट के न्यायाधीश लोकपाल कानून की धारा 14 के दायरे में आते है. हालांकि लोकपाल ने मामले पर आगे बढ़ने से पहले यह आदेश और शिकायत और संबंधित सामग्री पर विचार के लिए सीजेआई संजीव खन्ना को भेजा है. लोकपाल ने 27 जनवरी को यह आदेश दिया था. लोकपाल का यह आदेश हाई कोर्ट के न्यायधीशों के खिलाफ भ्र्ष्टाचार की शिकायतों पर सुनवाई का एक नया दरवाजा खोलता है.
बता दें कि लोकपाल को दो शिकायतें मिली थीं, जिनमें हाई कोर्ट के वर्तमान अतिरिक्त न्यायाधीश पर एक अतिरिक्त जिला जज और हाई कोर्ट के एक न्यायाधीश को एक कंपनी के मामले में प्रभावित करने का आरोप लगाया गया है. जिस हाई कोर्ट के न्यायाधीश के खिलाफ शिकायत की गई है, वह पहले वकालत करता था, उस दौरान वह प्राइवेट कंपनी उसका मुवक्किल थी.
जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट के न्यायाधीश लोकसेवक की परिभाषा में आते हैं और लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 न्यायाधीशों को इससे बाहर नहीं करता. जिन श्रेणियों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है, उनका स्पष्ट रूप से कानून में जिक्र है.
-भारत एक्सप्रेस
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