TMC internal crisis: पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी के लिए मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं. विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के भीतर हुई बड़ी टूट के बाद अब पार्टी के सांसदों को लेकर भी असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि विधानसभा के बाद लोकसभा और राज्यसभा में भी बगावत की गूंज सुनाई दे सकती है. यही वजह है कि पार्टी नेतृत्व डैमेज कंट्रोल में जुट गया है.
ऋतब्रत बनर्जी का असर
करीब 60 विधायकों के अलग होने के बाद TMC पहली बार इतने बड़े संकट से जूझ रही है. विधानसभा में यह बगावत इतनी गंभीर रही कि स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता मान्यता दे दी. अब सवाल उठ रहा है कि क्या यही घटनाक्रम संसद में भी दोहराया जाएगा.
राज्यसभा सांसद की आशंका
एक न्यूज एजेंसी की माने तो राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने भी इस संभावना को खुलकर सामने रखा. उनका कहना है कि जिस तरह कम समय में बड़ी संख्या में विधायक अलग हुए हैं वैसा ही असर लोकसभा में भी दिख सकता है. हालांकि उन्होंने राज्यसभा को लेकर साफ भविष्यवाणी नहीं की लेकिन संभावना से इनकार भी नहीं किया.
सौगत रॉय ने क्या कहा?
दूसरी ओर, वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय ने पार्टी में किसी बड़ी टूट की बात को खारिज कर दिया. उनका आरोप है कि बीजेपी संसद में भी वही खेल दोहराना चाहती है जो उसने विधानसभा में किया. उन्होंने भरोसा जताया कि ममता बनर्जी पहले भी मुश्किल हालात से निकली हैं और इस बार भी मजबूती से वापसी करेंगी.
नाराज सांसदों पर नजर
सबसे ज्यादा चर्चा बारासात सांसद काकोली घोष दस्तीदार को लेकर है. लोकसभा में चीफ व्हिप पद से हटाए जाने के बाद उनकी नाराजगी कई बार सामने आई. हालांकि उन्होंने खुद किसी बगावत की पुष्टि नहीं की है. सूत्रों की माने तो ममता बनर्जी ने हालात संभालने के लिए पिछले दो दिनों में कई नाराज विधायकों और सांसदों से सीधे बात की है. पार्टी ने दो भरोसेमंद सांसदों को बाकी सहयोगियों से लगातार संपर्क बनाए रखने की जिम्मेदारी दी है.
संसद में समीकरण
फिलहाल TMC के पास लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं. दलबदल कानून के तहत अगर दो-तिहाई सांसद अलग गुट बनाते हैं तो उनकी सदस्यता बच सकती है. इसी वजह से दो तरह की चर्चाएं चल रही हैं पहली, ‘ऋतब्रत मॉडल’ जिसमें सांसद अलग गुट बनाकर खुद को असली TMC बताने की कोशिश करें. दूसरी, किसी दूसरी पार्टी के साथ विलय का रास्ता.
चुनाव आयोग की भूमिका
पार्टी का चुनाव चिह्न और संगठन पर दावा सिर्फ संख्या से तय नहीं होगा. इसके लिए चुनाव आयोग के सामने यह साबित करना होगा कि असली बहुमत किसके साथ है. साफ है कि बंगाल की लड़ाई अब विधानसभा तक सीमित नहीं रह गई और संसद में भी इसका असर दिख सकता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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