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Veer Bal Diwas: साहिबजादों की शहादत की वो अमर गाथा, जिसने मुगलिया सल्तनत की नींव हिला दी

वीरता उम्र की मोहताज नहीं होती. मात्र 7 और 9 साल की आयु में धर्म और सत्य के लिए दीवार में जिंदा चिन जाने वाले गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों की प्रेरक कहानी, जो आज भी हर भारतीय को गौरवान्वित करती है.

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Veer Bal Diwas: भारतीय इतिहास की मिट्टी ऐसे वीर सपूतों के बलिदान से सींची गई है, जिनकी गाथाएं आज भी हमारी रगों में जोश भर देती हैं. वीरता का पैमाना उम्र नहीं, बल्कि वो अडिग संकल्प और फौलादी सीना है जो अन्याय के सामने झुकने से इनकार कर दे.

26 दिसंबर का दिन भारत के उसी शौर्य और स्वाभिमान का प्रतीक है, जब दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह जी के दो मासूम ‘लाल’ साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह ने मुगलिया सल्तनत की ईंट से ईंट बजा दी थी. महज़ 7 और 9 साल की उम्र में उन्होंने जो बलिदान दिया, उसने न केवल सिख पंथ बल्कि पूरे हिंदुस्तान के स्वाभिमान को नई ऊंचाइयां दीं.

सरसा की लहरें

सन् 1704-1705 की सर्दियों में आनंदपुर साहिब पर मुगल सेना और पहाड़ी राजाओं ने घेराबंदी कर दी थी. गुरु गोबिंद सिंह जी को अपने परिवार और सिखों के साथ किले को छोड़ना पड़ा. सरसा नदी पार करते समय भीषण युद्ध हुआ और इस आपाधापी में गुरु जी का परिवार बिखर गया. माता गुजरी जी अपने दो छोटे पोतों, जोरावर सिंह (9 वर्ष) और फतेह सिंह (7 वर्ष) के साथ बाकी समूह से अलग हो गईं.

गंगू का विश्वासघात (Veer Bal Diwas)

थकान और भूख से व्याकुल माता-पोते एक पुराने नौकर गंगू के घर पहुंचे. गंगू ने पहले तो उन्हें शरण दी, किंतु लालच में आकर उसने गद्दारी की और उन्हें नवाब वजीर खां के पास सरहिंद ले जाकर सौंप दिया. दोनों मासूमों को ‘ठंडे बुर्ज’ में कैद कर दिया गया. वहां की कड़कड़ाती ठंड और मानसिक यातनाओं के बावजूद माता गुजरी जी ने बच्चों को निरंतर यही सिखाया, “बेटा, हमारा धर्म हमें कभी झुकने नहीं देगा. हम सत्य और न्याय के लिए जीते हैं और उसी के लिए मरते हैं.”

दरबार में निडरता और धर्म की अडिग आस्था

नवाब वजीर खां ने दोनों बालकों को अपने दरबार में बुलाया और उन्हें इस्लाम कबूल करने का लालच दिया. उसने कहा कि यदि वे धर्म बदल लें, तो उन्हें धन-दौलत और महल दिए जाएंगे. इस पर छोटे फतेह सिंह ने निडर होकर जवाब दिया, “हमारा धर्म हमारा सबसे अनमोल रत्न है, इसे हम किसी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे.” जोरावर सिंह ने भी स्पष्ट किया कि उनके पिता ने उन्हें अन्याय के सामने सिर न झुकाना सिखाया है. वे मर सकते हैं, लेकिन विश्वासघात नहीं कर सकते.

क्रोधित होकर नवाब ने दोनों मासूमों को जिंदा दीवार में चुनवाने का आदेश दिया. 26 दिसंबर, 1705 की उस बर्फीली सुबह दोनों साहिबजादों को खड़ा कर दिया गया और ईंटें लगनी शुरू हुईं. जब तक दीवार उनके गले तक नहीं आ गई, वे अडिग खड़े रहे. उनकी आंखों में भय के बजाय एक दिव्य चमक थी. पोतों की शहादत के बाद माता गुजरी जी ने भी अपने प्राण त्याग दिए. यह बलिदान केवल दो बच्चों का नहीं, बल्कि स्वाभिमान की पराकाष्ठा थी.

राष्ट्रीय सम्मान की नई पहचान

इन छोटे वीरों की शहादत आज भी नई पीढ़ी को सच्चाई के लिए लड़ने की प्रेरणा देती है. साल 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाश पर्व पर यह घोषणा की कि 26 दिसंबर को ‘वीर बाल दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा. यह दिवस उन बालकों की वीरता को समर्पित है जिन्होंने साबित किया कि वीरता उम्र की मोहताज नहीं होती, बल्कि आंतरिक शक्ति से आती है.

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-भारत एक्सप्रेस



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