विधानसभा चुनाव के नतीजों से ठीक पहले कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री पद को लेकर सियासी सरगर्मी तेज हो गई है. वोटों की गिनती में अब महज़ एक हफ्ता से भी कम समय बाकी है, और अगर यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) को बहुमत मिलता है, तो मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए तीन वरिष्ठ नेताओं- वि डी सतीशन, रमेश चेन्निथला और के सी वेणुगोपाल-के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है.
मुकाबला अब सिर्फ राज्य तक सीमित नहीं
इस बार की लड़ाई को खास बनाता है इसका दायरा. पहले जहां मुख्यमंत्री पद की रेस राज्य स्तर के नेताओं के बीच ही सिमट जाती थी, वहीं इस बार कांग्रेस हाईकमान के अहम सदस्य के सी वेणुगोपाल की सक्रिय मौजूदगी ने समीकरण बदल दिए हैं. एक समय था जब कांग्रेस केंद्र की सत्ता में होने के कारण ऐसे टकराव को आसानी से संभाल लेती थी.
1995 में के करुणाकरण को हटाकर ए के एंटनी को मुख्यमंत्री बनाया गया, तो करुणाकरण को केंद्र में जगह देकर संतुलन बनाया गया. इसी तरह 2004 में एंटनी के इस्तीफे के बाद ओमन चांडी को मौका मिला और एंटनी को केंद्र में अहम जिम्मेदारी दी गई. लेकिन अब केंद्र में सत्ता से बाहर होने के कारण यह विकल्प लगभग खत्म हो चुका है.
तीन दावेदार, तीन मजबूत आधार
वी डी सतीशन,को जनता के बीच मजबूत समर्थन हासिल माना जा रहा है. पिछले पांच वर्षों में उन्होंने विपक्ष के नेता के रूप में पी विजयन सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया और UDF को एकजुट रखने की कोशिश की.
वहीं के सी वेणुगोपाल संगठन और हाईकमान के भरोसेमंद चेहरे हैं. टिकट वितरण में उनकी भूमिका के चलते बड़ी संख्या में उम्मीदवारों और संभावित विधायकों का झुकाव उनकी ओर माना जा रहा है.
दूसरी तरफ रमेश चेन्निथला अनुभव और वरिष्ठता के दम पर मजबूत दावेदारी पेश कर रहे हैं. वे सोनिया गांधी के करीबी माने जाते हैं और पार्टी के भीतर उनका लंबा राजनीतिक सफर उन्हें विश्वसनीय विकल्प बनाता है.
सोशल मीडिया बना नया रणक्षेत्र
तीनों खेमों ने अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का सहारा लिया है.
चेन्निथला ने “केरल यात्रा” नाम से पॉडकास्ट कर रहे है जिसमें वे अपने विज़न और राजनीतिक अनुभव को सामने रख रहे हैं.
वेणुगोपाल ने इस बहस से दूरी बनाए रखते हुए संयमित रुख अपनाया है और कहा है कि अंतिम फैसला चुनाव नतीजों के बाद तय प्रक्रिया के तहत होगा.
वहीं सतीशन कैंप ने आक्रामक रणनीति अपनाते हुए उन्हें पहले ही संभावित मुख्यमंत्री के तौर पर प्रचारित करना शुरू कर दिया है. हालांकि, अभी तक कोई विधायक खुलकर उनके समर्थन में सामने नहीं आया है.
अंदरूनी खींचतान, लेकिन फूट नहीं
पार्टी सूत्रों का मानना है कि इस प्रतिस्पर्धा के बावजूद कांग्रेस में किसी बड़े विभाजन की आशंका नहीं है. हाईकमान की भूमिका निर्णायक होगी और अंततः सभी नेता उसके फैसले को स्वीकार करेंगे.
4 मई पर टिकी नजरें
केरल में 9 अप्रैल को मतदान हो चुका है और 4 मई को नतीजे घोषित होंगे. अगर UDF सत्ता में वापसी करता है, तो मुख्यमंत्री पद को लेकर यह त्रिकोणीय मुकाबला और भी दिलचस्प हो जाएगा. अंततः यह लड़ाई सिर्फ कुर्सी की नहीं, बल्कि जनसमर्थन, संगठनात्मक ताकत और अनुभव के बीच संतुलन की होगी- जो तय करेगा कि केरल की कमान किस नेता के हाथों में जाएगी.
यह भी पढ़ें:
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.





