राजनीति में अपराधीकरण को रोकने के लिए सरकार जो बिल सरकार द्वारा पेश किया जा रहा है. उसमें प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और राज्यों को मंत्री पांच साल या उससे अधिक की अवधि की सजा वाले अपराध के लिए लगातार तीस दिनों तक हिरासत में रखा जाता है तो उसे पद से हटाया जा सकता है.
सरकार 130वां संविधान विधेयक लोक सभा में पेश करेगी. बिल के अनुसार अगर कोई मंत्री या प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री 5 साल या उससे ज्यादा सजा वाले गंभीर अपराध में आरोपी हो और लगातार 30 दिन हिरासत में रहता है, तो प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को सिफारिश कर सकते हैं कि उस मंत्री को हटाया जाए.
विधेयक में कहा गया है कि मंत्रीगण जनता के विश्वास का प्रतिनिधित्व करते हैं. उनका चरित्र, आचरण और नैतिकता संदेह से परे होनी चाहिए. अगर कोई मंत्री गंभीर आपराधिक आरोप में लंबे समय तक हिरासत में रहता है, तो वह संवैधानिक नैतिकता और सुशासन को प्रभावित करता है. इससे जनता का विश्वास डगमगा सकता है.
बिल के तहत तीन अहम अनुच्छेदों में संशोधन किया जाएगा. अनुच्छेद 75 केंद्र सरकार के मंत्रियों की नियुक्ति और पद की समाप्ति से जुड़ा है. अनुच्छेद 164 राज्यों के मंत्रियों पर लागू होगा. अनुच्छेद 239 AA केंद्रशासित प्रदेश (जैसे दिल्ली) में मुख्यमंत्री/ मंत्रियों के लिए एक नही तीन अहम बिल पेश होंगे.
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सुप्रीम कोर्ट में सजायाफ्ता नेताओं की अयोग्यता पर सुनवाई जारी
बता दें कि आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए सांसदों-विधायकों को आजीवन अयोग्य घोषित करने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है.
यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील और बीजेपी नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर की गई है. जिस याचिका पर पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने सलाह दिया था कि सजायाफ्ता नेताओं को जीवन भर चुनाव नहीं लड़ने देना चाहिए.
याचिका में कहा गया है कि आरपीए की धारा 8 के तहत 2 साल या उससे अधिक की सजा पाने वाले नेता को गलत रियायत दी गई है. ऐसा सजायाफ्ता नेता अपनी सजा पूरी करने के 6 साल बाद चुनाव लड़ने के योग्य हो जाता है. इस धारा को असंवैधानिक करार दिया जाना चाहिए.
एमिकस क्यूरी विजय हंसारिया ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि देश के दूसरे राज्यों में बार-बार सुनवाई टाल दी जाती है और सुनवाई टालने के कारण भी नहीं बताया जाता. इसपर कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि बहुत से ऐसे राज्य है जहां अबतक एमपी/एमएलए कोर्ट गठित नही की गई है.
विजय हंसारिया ने कोर्ट को सुझाव दिया है कि क्या चुनाव आयोग ऐसा नियम नहीं बना सकता कि राजनीतिक पार्टियों गंभीर अपराध में सजा पाए लोगों को पार्टी पदाधिकारी नहीं नियुक्त कर सकती.
एमिकस क्यूरी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दोषी ठहराए जाने के लिए सांसद या विधायक के चुनाव लड़ने पर छह साल की रोक लगती है. छह साल बाद वो फिर से चुनाव लड़ सकता ब. लिहाजा ये संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है.
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-भारत एक्सप्रेस
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