प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक डिग्री सार्वजनिक करने का मामला एक बार फिर दिल्ली हाई कोर्ट पहुंच चुका है. सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ अपील दायर की गई है. हालांकि देर से अपील दायर करने पर रोक ने नाराजगी जाहिर की है. हाई कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला की पीठ दायर अपील पर सुनवाई करेगी. कोर्ट 16 जनवरी 2026 को सुनवाई करेगा.
डिग्री को डीयू को दिखाने का मिला था आदेश
यह अपील आम आदमी पार्टी के नेता व राज्य सभा सांसद संजय सिंह, आरटीआई कार्यकर्ता नीरज शर्मा और अधिवक्ता इरशाद की ओर से दायर की गई है. सिंगल बेंच ने कोर्ट ने सीआईसी के उस आदेश को खारिज कर दिया था. जिसमें प्रधानमंत्री की बीए की डिग्री को दिल्ली विश्वविद्यालय को दिखाने का आदेश दिया था. जस्टिस सचिन दत्ता ने यह आदेश दिया था. मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि अपनी जिज्ञासा शांति के लिए कोई सूचना के अधिकार के तहत किसी दूसरे का निजी जानकारी को नहीं मांग सकता है.
डीयू ने यह याचिका 2017 में दाखिल किया था. जिसमें केंद्रीय सूचना आयोग के एक आदेश को चुनौती दी गई है. उसमें दिल्ली विश्वविद्यालय से वर्ष 1978 में बीए प्रोग्राम पास करने वाले छात्रों के रिकॉर्ड के निरीक्षण की अनुमति देने का निर्देश दिया था. पीएम नरेंद्र मोदी ने भी उस समय परीक्षा पास की थी. वर्ष 2017 में 24 जनवरी को पहली सुनवाई में ही कोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश पर रोक लगा दिया था.
निजी जानकारी लेने का अधिकार नहीं
एसजी मेहता ने कहा था कि यहां एक ऐसा मामला है, जिसमें एक अजनबी दिल्ली विश्वविद्यालय के आरटीआई कार्यालय में आता है और कहता है कि 10 लाख छात्रों में से मुझे एक्स की डिग्री दे दो. सवाल यह है कि क्या कोई अंदर आकर दूसरों की डिग्री मांग सकता है. जिज्ञासा के आधार पर किसी व्यक्ति को निजी जानकारी लेने का अधिकार नहीं है. इसके लिए वह आरटीआई के सहारा नही ले सकता है. इस तरह का तर्क भी मान्य नहीं है.
एसजी मेहता ने आगे कहा था कि जनता किसी चीज में दिलचस्पी ले सकती है, लेकिन वर्तमान मामला जनहित के नहीं है. आरटीआई में याचिका दायर करने वाले नीरज की ओर से पेश वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने कहा था कि मांगी गई जानकारी सामान्य रूप से किसी भी विश्वविद्यालय द्वारा नोटिस बोर्ड पर प्रकाशित की जाती है. यह तब कि विश्वविद्यालय की वेबसाइट और समाचार पत्रों के माध्यम से भी. यह वह सूचना है, जिसके आधार पर लोग निर्णय लेते है. कला में स्नातक की डिग्री के आधार पर ही मैं एलएलबी में प्रवेश ले सकता हूं. पुरानी डिग्री होने के नाते उसकी जानकारी दिए जाने से किसी को दिया जा सकता है.
खामियों के नाते आरटीआई अधिनियम का गलत प्रयोग
एसजी ने सुनवाई के दौरान कहा था कि इस तरह के आवेदन अनजान लोग दाखिल नहीं कर सकते. एसजी ने कहा था कि आरटीआई कार्यकर्ता अपने आप मे एक पदनाम बन गया है और पेशा है. लोगों के पास अब विजिटिंग कार्ड है. जबकि आरटीआई अधिनियम अच्छे उद्देश्य के लिए बनाया गया था. लेकिन उसमें कुछ खामियां भी है, और इसका दुरुपयोग किया जा रहा है. कई अदालतों ने इसको लेकर सचेत कर दिया है. एसजी मेहता ने गुजरात हाई कोर्ट के उस फैसले का हवाला दिया जिसमें सीआईसी के वर्ष 2016 के आदेश को रद्द कर दिया गया था.
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-भारत एक्सप्रेस
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