नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NLU) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने छात्रों के अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर बेहद अहम और दूरगामी टिप्पणी की है. उन्होंने स्पष्ट किया कि एक जीवंत लोकतंत्र में सवाल पूछना किसी भी रूप में बगावत या विद्रोह नहीं है. छात्रों को अपनी स्वतंत्र राय रखने या सवाल उठाने के लिए धमकाया नहीं जा सकता और न ही उन्हें दंडित करने की चेतावनी दी जा सकती है.
जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब हाल ही में नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) बेंगलुरु ने मुख्य अतिथि के चयन को लेकर छात्रों के विरोध के बाद अपना दीक्षांत समारोह रद्द कर दिया था. इसी घटना की पृष्ठभूमि में उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति के अधिकार और सवाल पूछने के महत्व को मजबूती से रेखांकित किया. संबोधन के दौरान जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा-
“शुरू में मैंने यह बात कहने के बारे में सोचा था, लेकिन फिर रुक गया कि हमें सत्ता व अथॉरिटी के प्रति अपना जरूरत से ज्यादा सम्मान का भाव छोड़ना होगा; चाहे वह सामान्य प्रशासन के प्रति हो या खास तौर पर न्यायपालिका के प्रति. हालांकि, यह एक अलग विषय है जिस पर दीक्षांत समारोह के बजाय किसी और दिन विस्तृत चर्चा करेंगे.”
विश्वविद्यालय विचारों पर सवाल उठाने की जगह: जस्टिस भुइयां
जस्टिस भुइयां ने विश्वविद्यालय के मूल स्वरूप को परिभाषित करते हुए कहा कि एक यूनिवर्सिटी केवल ऐसी संस्था नहीं है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान का हस्तांतरण करती है. यह एक ऐसा जीवंत मंच है जहाँ लोग ऐसे विचारों के संपर्क में आते हैं, जो उनके अपने स्थापित विचारों से भिन्न हो सकते हैं.
यहां स्थापित धारणाओं की तार्किक जांच की जाती है और उन पर खुले सवाल उठाए जा सकते हैं, जहाँ वैमनस्य या दुश्मनी के बजाय तर्कों और संवाद के जरिए असहमति व्यक्त की जाती है. एक स्वस्थ अकादमिक माहौल में यह बिल्कुल अनिवार्य नहीं है कि हर व्यक्ति एक ही निष्कर्ष पर पहुंचे.
सवालों को बगावत समझना गलत
जस्टिस भुइयां ने दो टूक कहा कि लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार किसी विद्रोह का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह नागरिकता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संविधान के प्रति जिम्मेदारी का एक अनिवार्य हिस्सा है. उन्होंने कहा कि जब छात्र किसी मुद्दे पर अलग राय रखते हैं या सवाल खड़े करते हैं, तो उन्हें इसके लिए डराया या दबाया नहीं जा सकता. छात्रों को सजा देने की धमकी देना पूरी तरह अस्वीकार्य है. ऐसा व्यवहार असंवैधानिक है और यह सीधे तौर पर सत्ता तथा पद के दुरुपयोग के समान है.
असहमति लोकतंत्र का मूल- जस्टिस भुइयां
जस्टिस भुइयां ने भारतीय संविधान के मूल दर्शन को रेखांकित करते हुए कहा कि हमारा संविधान नागरिकों से विचारों में किसी प्रकार की जबरन एकरूपता की अपेक्षा नहीं करता. लोकतंत्र की असली खूबसूरती ही इसमें है कि उसमें अलग-अलग विचारों, मतों और दृष्टिकोणों के लिए पर्याप्त जगह होती है. उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि-
“असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण और अभिन्न हिस्सा है. किसी व्यक्ति, सत्ता या संस्था के प्रशासनिक फैसले पर सवाल उठाना पूरी तरह से लोकतांत्रिक अधिकारों के दायरे में आता है. केवल अलग राय या असहमत दृष्टिकोण रखने के कारण किसी भी छात्र या नागरिक को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए.”
अंत में उन्होंने रेखांकित किया कि विश्वविद्यालय युवाओं को स्वतंत्र रूप से सोचने, सवाल करने और विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय बनाने के लिए तैयार करते हैं. छात्रों की असहमति को दबाने के बजाय उसे एक स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद के रूप में देखा जाना चाहिए; छात्रों को कभी भी भय या दंड के माहौल में रखकर संवाद नहीं कराया जा सकता.
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