Bharat Express DD Free Dish
Kanya Sumangla Mission Shakti Digital
Kanya Sumangla Mission Shakti Digital

क्या विधानसभा के विशेषाधिकार अभिव्यक्ति की आजादी से ऊपर है? सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच तय करेगी दायरा

सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ यह तय करेगी कि राज्य विधानसभाओं के विधायी विशेषाधिकार और नागरिकों की अभिव्यक्ति एवं प्रेस की स्वतंत्रता में टकराव होने पर संवैधानिक संतुलन कैसे कायम किया जाए.

सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों के लिए मानक प्रारूप तय करने की मांग पर सुनवाई को तैयार.

सुप्रीम कोर्ट

क्या विधानसभा के विधायी विशेषाधिकार नागरिकों के अभिव्यक्ति की आजादी के मौलिक अधिकार से ऊपर हो सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों की बेंच इसपर विचार करेगी. सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह निर्देश दिया है. कोर्ट इस मुद्दे पर 6 अक्टूबर से सुनवाई शुरू करेगा. तमिलनाडु विधानसभा से जुड़ा हुआ यह मामला है.

मामले में संविधान के अनुच्छेद 194 के तहत राज्य विधानसभाओं को हासिल विशेषाधिकारों और अनुच्छेद 19 (1)(a) के तहत नागरिकों को मिले अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संबंध की संवैधानिक व्याख्या की जानी है. साल 2003 में तमिलनाडु में तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता की सरकार के दौरान अखबार द हिंदू में प्रकाशित एक संपादकीय को लेकर विधानसभा ने आरोप लगाया था कि अखबार ने सदन की कार्यवाही को गलत तरीके से पेश किया और ऐसी टिप्पणियां प्रकाशित की, जो विधानसभा के विशेषाधिकार का उल्लंघन करती है.

7 नवंबर 2023 को तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष के. कालीमुथु ने विशेषाधिकार के उल्लंघन से जुड़ा प्रस्ताव पारित किया गया. इसके बाद विधानसभा ने अखबार के संपादकीय विभाग से जुड़े कई लोगों की गिरफ्तारी और हिरासत का आदेश दिया था. इनमें हिंदू के संपादक एन रवि शामिल थे. जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है.

सात सदस्यीय संविधान पीठ करेगी मामले की सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने 10 नवंबर 2003 को गिरफ्तारी पर रोक लगा दिया था. इससे पहले मामले को पांच जजों के संविधान पीठ के पास भेजा गया था. बाद में संविधान पीठ ने पाया कि इस विषय पर पहले के फैसलों में मतभेद हैं और इसलिए अंतिम एवं स्पष्ट संवैधानिक व्याख्या के लिए इसे सात जजों की संविधान पीठ को भेजा गया.

यह मामला प्रेस की स्वतंत्रता, पत्रकारों के अधिकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच संवैधानिक संतुलन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है. विधानसभाओं को अपने कामकाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए विशेषाधिकार दिए गए हैं. लेकिन दूसरी तरफ संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता भी देता है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि इन दोनों संवैधानिक व्यवस्थाओं के बीच संतुलन किस तरह कायम किया जाए.

ये भी पढ़ें- सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक अधिकारियों को दो टूक, व्यक्तिगत मामलों में बार-बार याचिका दाखिल करने से बचें

Also Follow Bharat Express on Youtube

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Kanya Sumangla Mission Shakti Digital