दिल्ली हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति कानून 2019 के प्रावधानों को लागू करने की मांग वाली याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को पक्षकार बनाने की अनुमति दे दी है. साथ ही कोर्ट ने 6 सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा है. दिल्ली हाई कोर्ट शैक्षणिक और आधिकारिक रिकार्ड में ट्रांसजेंडर्स के नाम कैसे प्रदर्शित होना चाहिए, इसपर दिल्ली हाई कोर्ट विचार करेगा. कोर्ट 15 जुलाई को इस मामले में अगली सुनवाई करेगा.
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की पीठ ने कहा कि यह मामला सिर्फ शैक्षणिक प्रमाणपत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके असर काफी व्यापक हो सकते हैं. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मुद्दा जन्म और मृत्य प्रमाणपत्र, पासपोर्ट, आधार कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस जैसे कई सरकारी दस्तावेजों पर भी प्रभाव डाल सकता है. कोर्ट ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी, जिनमें ट्रांसजेंडर पर्सन्स एक्ट 2019 के प्रावधानों को लागू करने की मांग की गई है. दिल्ली हाई कोर्ट रिया शर्मा, आरव सिंह और राघव पी. आर द्वारा 2017 और 2019 में दाखिल की गई थी.
इससे पहले 9 अप्रैल को सुनवाई के दौरान सीबीएसई की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया था कि ट्रांसजेंडर पर्सन्स संशोधन अधिनियम 2026 लागू किया गया है. इसके तहत 2019 कानून की धारा 2 (K) में ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा में बदलाव किया गया है.
दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया
बता दें कि ट्रांसजेंडर संशोधित बिल 2026 को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार, देश के सभी राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. दायर याचिका में बिना किसी मेडिकल दखल के, अपने लिंग का स्वयं निर्धारण करने के अधिकार की मांग की गई है. यह याचिका डॉक्टर चंद्रेश जैन की ओर से दायर की गई है. इस संशोधन में साल 2019 के कानून के आर्टिकल 4(2) हटाने का प्रस्ताव है. इसमें जेंडर के सेल्फ आइडेंटिफिकेशन के अधिकार का जिक्र था.
ट्रांसजेंडर अधिकारों और कानून में बदलाव पर बहस तेज
नई परिभाषा के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति जिनका संबंध किन्नर, हिजड़ा, अरावनी या जोगता जैसे सामाजिक सांस्कृतिक पहचान वाले समुदाय से है, उन्हें ट्रांसजेंडर माना जाएगा. इसके अलावा इंटरसेक्स लोगों को भी इस परिभाषा के अन्तर्गत रखा गया है. इसमें सबसे बड़ा बदलाव यह है कि यह 2019 कि तुलना में ट्रांसजेंडर पहचान को सीमित कर देती है. इसमें अब सेल्फ आइडेंटिफिकेशन वाले ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को जगह नहीं मिली है.
इसके अलावा नए बिल में सजा का भी प्रावधान है, नए बिल में बच्चों को ट्रांसजेंडर बनाने पर आजीवन कारावास की सजा व 5 लाख रुपए जुर्माना का प्रावधान है. वही बालिग के मामले में 10 साल तक कि सजा व दो लाख तक का जुर्माना हो सकता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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