दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि धोखाधड़ी के गंभीर आरोप, विशेष रूप से सार्वजनिक प्राधिकरणों या विदेशी संस्थाओं से जुड़े मामलों का निपटारा मध्यस्थ न्यायाधिकरणों के बजाय सिविल कोर्ट में बेहतर तरीके से हो सकता है. जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने यह टिप्पणी भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) के खिलाफ बेंटवुड सीटिंग सिस्टम की अपील को खारिज करते हुए की.
कोर्ट ने एकल मध्यस्थ के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि धोखाधड़ी के आरोपों की जटिलता और गंभीरता के कारण यह विवाद मध्यस्थता योग्य नहीं है. जस्टिस प्रसाद ने कहा कि मध्यस्थ का यह निष्कर्ष उचित है कि सिविल अदालतें ऐसे मामलों में बेहतर निर्णय लेने में सक्षम हैं और इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह नहीं कहा जा सकता कि मध्यस्थ ने धोखाधड़ी के आरोपों पर सरसरी तौर पर विचार किया है, क्योंकि इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गवाहों को पेश करना और विदेशी दस्तावेजों की जांच भी शामिल होती है.
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला नवंबर 2017 में कई हवाई अड्डों पर 4,000 बैगेज ट्रॉलियों की आपूर्ति और रखरखाव के लिए जारी किए गए टेंडर से जुड़ा है. बेंटवुड सीटिंग सिस्टम ने दावा किया था कि वह एक चीनी निर्माता, सूझौ जिंटा मेटल वर्किंग का भारतीय सहयोगी है. कंपनी ने पात्रता मानदंड पूरा करने के लिए विभिन्न हवाई अड्डों से जारी प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए थे.
हालांकि, अक्टूबर 2017 में गिल्को एक्सपोर्ट्स इंडिया ने एक शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि बेंटवुड सीटिंग सिस्टम ने टेंडर हासिल करने के लिए जाली दस्तावेज पेश किए हैं. जांच में पाया गया कि किसी भी हवाई अड्डे ने कंपनी को कोई प्रमाणपत्र जारी नहीं किया था और सूझौ ने भी बेंटवुड सीटिंग सिस्टम के साथ किसी भी प्रकार के संबंध से इनकार कर दिया था. इससे प्रस्तुत दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर गंभीर संदेह उत्पन्न हुआ.
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ब्लैकलिस्टिंग और कानूनी कार्रवाई
इस मामले में फरवरी 2018 में भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) ने अनुबंध को समाप्त कर दिया और बेंटवुड सीटिंग सिस्टम को ब्लैकलिस्ट कर दिया. बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस विवाद को एक नए मध्यस्थ के पास भेज दिया, जिसने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी के आरोपों की गंभीरता और जटिलता को देखते हुए यह मामला मध्यस्थता योग्य नहीं है. अब हाईकोर्ट ने उसी फैसले को बरकरार रखते हुए स्पष्ट कर दिया कि ऐसे मामलों का समाधान सिविल कोर्ट में किया जाना चाहिए.
-भारत एक्सप्रेस
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