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बारामूला सांसद राशिद इंजीनियर को मिली अंतरिम जमानत, दिल्ली हाई कोर्ट ने लगाई ये कड़ी शर्तें

जम्मू-कश्मीर टेरर फंडिंग मामले में तिहाड़ जेल में बंद बारामूला के सांसद राशिद इंजीनियर को दिल्ली हाई कोर्ट से एक बड़ी राहत मिली है. पिता के निधन के बाद उन्हें 2 जून तक के लिए किन सख्त शर्तों के साथ अंतरिम जमानत दी गई है?

दिल्ली हाई कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर टेरर फंडिंग मामले में आरोपी और बारामूला से सांसद राशिद इंजीनियर को अंतरिम जमानत दे दी है. इंजीनियर ने पिता की मौत के बाद दिल्ली हाई कोर्ट में अर्जेंट मेंशनिंग कर जमानत की गुहार लगाई थी. जिसके बाद कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ जमानत दे दी है. कोर्ट ने कहा कि अदालत को दिए गए घर के पते के अलावा वे और कहीं नहीं जा सकते हैं. कोर्ट ने कहा कि दिए गए मोबाइल नंबर के अलावा वे और कोई मोबाइल नंबर इस्तेमाल नहीं करेंगे और जमानत के दौरान पुलिस के घेरे में रहेंगे. कोर्ट ने यह अंतरिम जमानत 18 मई से 2 जून तक के लिए दी है.

पिता की बीमारी और कस्टडी पैरोल पर एजेंसी का तर्क

इससे पहले कोर्ट ने पिता के बीमार होने पर 10 मई तक के लिए अंतरिम जमानत दी थी, जिसके बाद उन्होंने कोर्ट के आदेश के मुताबिक सरेंडर कर दिया था. एजेंसी ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कहा था कि जमानत के बजाय कस्टडी पैरोल दी जा सकती है, जिससे राशिद इंजीनियर अपने पिता और परिवार के सदस्यों से मिल सकेंगे.

संसद सत्र और 2024 लोकसभा चुनाव में जीत

इससे पहले कोर्ट ने इंजीनियर राशिद को हिरासत में संसद सत्र में हिस्सा लेने की अनुमति दी थी. कोर्ट ने इंजीनियर राशिद को 28 जनवरी से 2 अप्रैल तक संसद के पूरे सत्र में हिस्सा लेने की अनुमति दी थी. नवंबर 2025 में भी कोर्ट ने राशिद को संसद सत्र में हिस्सा लेने की अनुमति दी थी. वे साल 2019 से ही तिहाड़ जेल में बंद हैं. राशिद इंजीनियर ने 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तरी कश्मीर की बारामूला सीट से चुनाव लड़ा था और उमर अब्दुल्ला को दो लाख से अधिक वोटों से हराया था.

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टेरर फंडिंग मामला और NIA की चार्जशीट

पटियाला हाउस कोर्ट ने 16 मार्च 2022 को हाफिज सईद, सैयद सलाहुद्दीन, यासीन मलिक, शब्बीर शाह, मसरत आलम, राशिद इंजीनियर, जहूर अहमद वताली, बिट्टा कराटे और आफताब बट्ट उर्फ पीर सैफुल्ला के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया था. एनआईए के मुताबिक पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) के सहयोग से लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन, जेकेएलएफ और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों ने जम्मू कश्मीर में आम नागरिकों और सुरक्षा बलों पर हमले और हिंसा को अंजाम दिया. 1993 में अलगाववादी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए ऑल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस की स्थापना की गई थी.



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