Bharat Express DD Free Dish
Kanya Sumangla Mission Shakti Digital
Kanya Sumangla Mission Shakti Digital

‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’, उमर खालिद और शरजील इमाम मामले में सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

उमर खालिद और शरजील इमाम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसी तल्ख टिप्पणी की है, जिसने UAPA जैसे सख्त कानून के तहत जमानत के नियमों पर नई बहस छेड़ दी है. आखिर कोर्ट ने क्यों कहा कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’?

supreme-court

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगा मामले में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को लेकर बड़ी टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’. कोर्ट ने कहा कि यह सिद्धांत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 22 से निकलता है और किसी भी सभ्य समाज की बुनियाद निर्दोषता की धारणा पर टिकी है. जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने यह टिप्पणी की है.

उमर खालिद और नार्को टेरर आरोपी पर टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि उमर खालिद को जमानत न देने के फैसले में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच द्वारा फैसला नहीं किया गया. कोर्ट ने यह टिप्पणी साढ़े पांच साल से नार्को टेरर गतिविधियों में शामिल होने के आरोपी सईद इफ्तिखार आंद्राबी को जमानत देते हुए की है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक डिवीजन बेंच बड़ी बेंचों के फैसलों से बंधी होती है, और नजीब मामले में तीन जजों की बेंच ने एक फैसला दिया था.

यूएपीए (UAPA) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता

कोर्ट ने यह भी कहा कि यूएपीए की धारा 43 (डी) (5) को जमानत खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान की मूल भावना है और सख्त कानून भी इसे खत्म नहीं कर सकता. कोर्ट ने यह भी कहा कि स्वतंत्रता का अधिकार केवल एक वैधानिक नारा नहीं, बल्कि एक संवैधानिक प्रावधान है, जिसका हर हाल में पालन किया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी के उस फैसले पर भी आपत्ति जताई, जिसके तहत उमर खालिद और शरजील इमाम को एक साल तक रोका गया.

ये भी पढ़ें: रॉबर्ट वाड्रा ने दिल्ली हाई कोर्ट से वापस ली याचिका, निचली अदालत से मिली जमानत

सजा की दर और बड़ी बेंच का महत्व

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने अपने फैसले में एनसीआरबी का हवाला देते हुए कहा कि यूएपीए मामलों में सजा की दर बेहद कम है. उन्होंने कहा कि 2019 से 2023 के बीच पूरे देश में यूएपीए मामलों में दोषसिद्धि की दर न्यूनतम 1.5 फीसदी और अधिकतम 4 फीसदी है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि छोटी बेंचें बड़ी बेंचों के फैसलों को कमजोर, दरकिनार या नजरअंदाज नहीं कर सकतीं. अगर किसी छोटी बेंच को बड़े फैसले पर संदेह हो, तो उसे मामला बड़ी बेंच के पास भेजना चाहिए.



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Kanya Sumangla Mission Shakti Digital