दिल्ली हाई कोर्ट ने 1889 करोड़ रुपए के जिंदल आईटीई लिमिटेड और एनटीपीसी मामले में विभाजित फैसला दिया है. अब मामले को तीन जजों के बेंच के पास भेजा गया था. यह विवाद फरक्का थर्मल पावर प्लांट तक आयातित कोयले की ढुलाई से जुड़े प्रोजेक्ट में देरी, काम में बदलाव और कोयले की तय मात्रा की आपूर्ति नही होने को लेकर है.
मामला अगस्त 2011 में हुए एक त्रिपक्षीय समझौते से जुड़ा है. इसमें एनटीपीसी, जिंदल आईटीएफ और इनलैंड वॉरवायस ऑथोरिटी ऑफ इंडिया (आईडब्ल्यूएआई) पक्षकार थे. समझौते के तहत जिंदल आईटीएफ को कोयला उतारने और उसकी हैंडलिंग से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना था और फिर अंतर्देशीय जलमार्ग के जरिए कोयले को एनटीपीसी के फरक्का प्लांट तक पहुचाना था. प्रोजेक्ट दो चरणों में पूरा हुआ.
जिंदल आईटीएफ ने नवंबर 2016 में आर्बिट्रेशन का रुख किया
जिंदल आईटीएफ ने नवंबर 2016 में आर्बिट्रेशन का रुख किया था. कंपनी का आरोप था कि प्रोजेक्ट में हुई देरी और बदलाव एनटीपीसी की वजह से हुए और उसे पर्याप्त मात्रा में कोयला भी उपलब्ध नहीं कराया गया. इसके बाद एनटीपीसी ने जुलाई 2017 में समझौता खत्म कर दिया. जनवरी 2019 में आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने जिंदल आईटीएफ के पक्ष में चार प्रमुख दावों पर करीब 1889 करोड़ रुपए का आवार्ड दिया म इसमें करीब 424 करोड़ प्रोजेक्ट अवधि के दौरान देरी, बदलाव और शॉर्टफॉल से संबंधित थे.
वहीं पहले और दूसरे साल न्यूनतम गारंटीड मात्रा में कोयला उपलब्ध नही कराने के लिए क्रमशः करीब 158 करोड़ और 198 करोड़ दिए गए. अपील पर सुनवाई करने वाले जस्टिस हरि शंकर ने आवार्ड को सही माना. उनका कहना है कि केवल इसलिए ट्रिब्यूनल के निष्कर्षो को दोबारा नहीं खोला जा सकता क्योंकि कोर्ट सबूतों की अलग व्याख्या करता है. करीब 1109 करोड़ के टर्मिनेशन संबंधी अवॉर्ड को भी उन्होंने बरकरार रखा.
एनटीपीसी अनुबंध विवाद में ट्रिब्यूनल के फैसले पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
उनके मुताबिक जब एनटीपीसी की ओर से अनुबंध समाप्त करना अवैध पाया गया, तो ट्रिब्यूनल अनुबंध की बची हुई पांच साल की अवधि के लिए गारंटीड कोयले की मात्रा को उचित मुआवजे के निर्धारण का आधार बन सकता था. जस्टिस हरिशंकर ने कहा कि सिंगल जज ने प्रभावी रूप से विवाद की दोबारा सुनवाई की और ट्रिब्यूनल के फैसले पर अपीलीय अधिकार का इस्तेमाल किया.
वहीं जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला ने सिंगल जज के फैसले से सहमति जताई.उन्होंने माना कि अनुबंध में देरी और टर्मिनेशन की स्थिति से निपटने के लिए विशेष व्यवस्था पहले से तय थी. ट्रिब्यूनल इन संविदात्मक व्यवस्थाओं को हटाकर अलग तरीके से मौद्रिक मुआवजा तय नहीं कर सकता था. उन्होंने यह भी कहा कि प्रोजेक्ट ऑपरेटर के तौर पर जिंदल आईटीएफ पर जरूरी परमिट और मंजूरियां हासिल करने की जिम्मेदारी से जुड़े अनुबंध के प्रावधानों पर उचित तरीके से विचार नहीं किया गया.
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-भारत एक्सप्रेस
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