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‘इंतजार क्यों किया?’ यशवंत वर्मा से कोर्ट ने पूछे तीखे सवाल, जवाब में क्या बोले कपिल सिब्बल?

Justice Yashwant Verma Case: सुप्रीम कोर्ट में आज जस्टिस यशवंत वर्मा केस की सुनवाई हुई. इस दौरान कोर्ट ने तीखे सवाल किए हैं. आइये जानें SC के सवालों पर यशवंत वर्मा के वकील कपिल सिब्बल ने क्या कहा?

Yashwant Verma case hearing in Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट में यशवंत वर्मा केस की सुनवाई

Justice Yashwant Verma Case: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस यशवंत वर्मा से तीन सदस्यीय न्यायिक समिति की रिपोर्ट और उसकी वैधता को चुनौती वाली याचिका पर सुनवाई की है. इस दौरान कपिल सिब्बल ने जस्टिस वर्मा का बचाव करते हुए उन्होंने कई दलीलें दी हैं. हालांकि, कोर्ट ने भी उनसे कई तीखे सवाल किए हैं. अब मामले की सुनवाई बुधवार के लिए टाल दी गई है. आइये जानें आज कोर्ट रूम में क्या-क्या हुआ?

जस्टिस वर्मा के दिल्ली आवास में आग लगने के बाद बड़ी मात्रा में नकदी बरामद हुई थी. इसके बाद मामले ने तूल पकड़ा तो उन्हें इलाहाबाद भेज दिया गया था. SC ने जांच समिति बनाई थी. अब जस्टिस वर्मा, उनपर अभियोग लगाने वाली आंतरिक समिति की रिपोर्ट को चुनौती दी है. इसी मामले पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई.

कोर्ट में में क्या-क्या हुआ?

जस्टिस वर्मा के केस की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एजी मसीह की पीठ में हुई है. जस्टिस यशवंत वर्मा को पक्ष रखने के लिए सीनियर वकील कपिल सिब्बल पेश हुए थे. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के तीखे सवालों का जवाब दिया है और अपने क्लाइंट का बचाव किया है.

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा से पूछा

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जस्टिस यशवंत वर्मा से पूछा कि उन्होंने आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट आने का इंतजार क्यों किया और फिर इसकी वैधता को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट क्यों आए? न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एजी मसीह की पीठ ने जस्टिस वर्मा से पूछा, जब समिति नियुक्त की गई थी, तब आपने चुनौती क्यों नहीं दी? आपने इंतज़ार क्यों किया? न्यायाधीश पहले भी इन कार्यवाहियों में शामिल होने से बचते रहे हैं.

सवाल-जवाब

सिब्बल ने दावा किया कि जज के खिलाफ कोई मामला साबित नहीं हुआ है. अगर आउटहाउस में नकदी मिली है तो दुर्व्यवहार कहां से आया. इसपर कोर्ट ने कहा कि उन्होंने न तो नकदी की मौजूदगी से इनकार किया है और न ही आग लगने की घटना से. इसपर सिब्बल ने कहा कि लेकिन यह मेरा नहीं है. उन्हें यह पता नहीं चला है कि नकदी किसकी है. जस्टिस दत्ता ने जवाब दिया कि इन-हाउस रिपोर्ट केवल एक प्रारंभिक रिपोर्ट है और यह साक्ष्य नहीं है.

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सिब्बल ने तर्क दिया कि किसी जज को केवल संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत ही हटाया जा सकता है. इसके लिए आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट पर आधारित सार्वजनिक बहस के जरिए कोई फैसला नहीं हो सकता है. उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है. 22 मार्च को टेप जारी किया गया. पूरे देश में इस मामले पर चर्चा होने लगी. सुनवाई या सिद्धी से पहले ही आदमी दोषी ठहराया जा चुका है.

महाभियोग संसद का अधिकार

कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि जजों का पैनल महाभियोग की सिफारिश नहीं कर सकता, क्योंकि यह पूरी तरह से संसद के अधिकार क्षेत्र में है. इसके सिब्बल ने  टेप जारी करना, उसे वेबसाइट पर डालने पर भी आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि यह संविधान के विरुद्ध है. उन्होंने तर्क दिया कि रिपोर्ट के निष्कर्षों के जारी होने से प्रक्रिया का राजनीतिकरण हो गया. हालांकि, जस्टिस दत्ता ने कहा कि महाभियोग प्रक्रिया भी राजनीतिक है. उन्होंने यह भी कहा कि जांच में भाग लेने के बाद समिति की वैधानिकता पर कैसे सवाल उठाया जा सकता है.

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को रिपोर्ट भेजना

जस्टिस वर्मा के वकील कपिल सिब्बल ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को रिपोर्ट भेजने याचिकाकर्ता को हटाने की सिफारिश पर आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि आंतरिक प्रक्रिया के अनुसार जज को हटाने की सिफारिश चीफ जस्टिस के अधिकार क्षेत्र की नहीं है. रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजना भी गलत था. क्योंकि, महाभियोग का मामला संसदों द्वारा सदन में आना चाहिए न कि इसे सरकार पेश कर सकती है.

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सिब्बल की इस बात पर जस्टिस दत्ता ने असहमति जताई. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति किसी जज के नियुक्ति प्राधिकारी होते हैं. इस नाते मामला राष्ट्रपति के समक्ष रखा जाना चाहिए था. वहीं राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता से काम करते हैं. इस कारण इसे प्रधानमंत्री को भेजने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए.

बुधवार को अगली सुनवाई

गौरतलब है कि पिछले सप्ताह राज्यसभा और लोकसभा के सांसदों ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग का नोटिस दिया है. इसके बाद जस्टिस वर्मा ने खुद को हटाने की सिफारिश को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है. उन्होंने आरोप लगाया है कि आंतरिक जांच बिना औपचारिक शिकायत के शुरू की गई और प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से आरोपों का सार्वजनिक होना उन्हें मीडिया आलोचना का सामना करना पड़ा. अब मामले की सुनवाई बुधवार को होने वाली है.



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