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Pending Court Cases: देश भर की अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या को कम करने और अदालतों में बुनियादी समस्याओं को दूर करने की मांग लगातार उठती रहती है. सरकार भी इसको लेकर समय-समय पर पैसा जारी करती रहती है, लेकिन उसके बावजूद समय पर लोगों को इंसाफ नही मिल पा रहा है.
E-Court प्रोजेक्ट में क्या-क्या?
सरकार ने ई-कोर्ट के तीसरे चरण के लिए 1240 करोड़ रुपए का प्रावधान रखा है, ताकि न्याय व्यवस्था अपनी रफ्तार पकड़ सके. अदालतों का डिजिटलीकरण, उन्हें पेपरलेस बनाना, वर्चुअल सुनवाई, ऑनलाइन फाइलिंग आदि ई-कोर्ट प्रोजेक्ट का हिस्सा है. देश मे आम लोगों की जल्द न्याय मिले इसके लिए सरकार का दावा है कि वह लगातार प्रयास कर रही है.
इतना ही नहीं आकड़ो में लंबित मुकदमों के अम्बर को देखकर कानून मंत्री न्यायपालिका के सिस्टम को मजबूत करने और बढ़ाने का रोज वादा करते है. लेकिन सरकार द्वारा गठित समिति ने सरकार के दावों की पोल खोल कर रख दी है. समिति की माने तो देश के कई ऐसे अदालत है जहां पर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं है.
10 सालों में 400 करोड़ का खर्च
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले 10 साल में मुकदमें लड़ने पर 400 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुका है. जबकि 2023-24 में मुकदमेबाजी पर केंद्र सरकार का 66 करोड़ रुपए खर्च हो चुका है.वहीं, 2022-2023 में 9 करोड़ रुपए से अधिक खर्च हो चुका है.
बता दें कि देशभर की अदालतों में 5.4 करोड़ से ज्यादा मुकदमा लंबित है. इसमें से 60 लाख ऐसे मामले है जो 10 साल से अधिक समय से लंबित है. इलाहाबाद हाईकोर्ट में 11.3 लाख मामले लंबित हैं.
वहीं, राजस्थान हाई कोर्ट में 6.8 लाख, महाराष्ट्र हाई कोर्ट में 6.6 लाख और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 4.8 लाख मुकदमे लंबित है. हालांकि मुकदमा लंबित होने के एक कारण जजों की कमी भी बताया जाता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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