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‘राष्ट्रपति से लेकर जज तक झुकते हैं देवताओं के आगे’, एसजी तुषार मेहता ने सबरीमाला केस में दी सनातन की दुहाई

सबरीमाला मंदिर से जुड़े मामले में दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करते हुए इन याचिकाओं का समर्थन किया है.

Supreme Court Final Deadline in Sheena Bora Murder Case

सबरीमाला के मामले में दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर केंद्र सरकार ने अपना जवाब दाखिल कर दिया है. केंद्र सरकार ने पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन किया है. इस संविधान पीठ में सीजेआई सूर्यकांत समेत जस्टिस बी. वी नागरत्ना, जस्टिस एम. एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन मसीह, जस्टिस प्रसन्ना वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल है.

केंद्र सरकार द्वारा दाखिल जवाब में कहा गया है कि यह मामला केवल लैंगिक समानता का नही, बल्कि धार्मिक आस्था, परंपरा और संप्रदायिक स्वायत्तता से जुड़ा हुआ है. केंद्र सरकार ने अदालत को आगाह किया है कि धार्मिक परंपराओं को तर्कसंगतता, आधुनिकता के पैमाने पर परखना न्यायिक अतिक्रमण होगा. केंद्र सरकार ने कहा कि पूजा की जगह में कौन जा सकता है, यह लिंग भेदभाव का मामला नहीं है, बल्कि यह धार्मिक रीति-रिवाजों, मान्यताओं और देवता के खास स्वरूप पर आधारित है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह भी कहा कि महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने से यहां की पूजा-पद्धति का मूल स्वरूप ही बदल जाएगा, जिससे संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक बहुलवाद कमजोर होगा.  श्रद्धालु (पुरुष और महिला) दोनों सदियों से सबरीमाला में मंदिर की स्थापित परंपराओं के अनुसार ही भगवान अयप्पा की पूजा करते आ रहे हैं. सरकार ने कहा कि यह जांच करना कि कोई धार्मिक प्रथा तर्कसंगत है या नहीं, संवैधानिक समीक्षा का हिस्सा नहीं हो सकता. सरकार ने यह भी कहा कि न्यायाधीश न तो धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या करने के लिए प्रशिक्षित हैं और न ही वे धार्मिक-थियोलॉजिकल प्रश्नों का निर्णय लेने के लिए संस्थागत रूप से सक्षम है. केंद्र सरकार ने आवश्यक धार्मिक प्रथा के सिद्धांत पर भी सवाल उठाए है.

महिलाओं के प्रवेश पर रोक को बताया धार्मिक परंपरा का हिस्सा

केंद्र सरकार द्वारा दाखिल जवाब में यह भी कहा गया है कि सबरीमाला मंदिर में भगवान अय्यपा की पूजा नैष्ठिक ब्रह्मचारी के रूप में होती है. महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध इस स्वरूप से जुड़ा है. यह प्रतिबंध किसी भेदभाव का नहीं, बल्कि धार्मिक परंपरा का हिस्सा है. केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने धार्मिक विविधता दिखाने के लिए अजमेर दरगाह और शिरडी साईंबाबा मंदिर का उदाहरण दिया. सुप्रीम कोर्ट का इरादा अप्रैल के अंत तक इस मामले की सुनवाई और निपटारा करने का है. 9 जजों की संविधान पीठ ने याचिककर्ताओ को 7 से 9 अप्रैल तक सुनवाई के लिए समय दिया है. जबकि विरोधियों की सुनवाई के लिए 14 से 16 अप्रैल, प्रतिवाद प्रस्तुतियां 21 अप्रैल को सुनी जाएंगी. जिसके बाद 22 अप्रैल को एमिकस क्यूरी अंतिम दलीलें रखेंगे.

सनातन धर्म को बताया बहुस्तरीय और विशाल संरचना

मामले की सुनवाई के दौरान एसजी मेहता ने कहा कि हिंदू धर्म की सबसे बड़ी खासियत उसकी व्यापकता और लचीलापन है. उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति आस्तिक न होकर भी खुद को हिंदू मान सकता है. यही इसकी खूबसूरती है. उन्होंने आगे कहा कि जिसे हम सनातन या हिंदू धर्म कहते हैं, वह एक बेहद विशाल और बहु स्तरीय संरचना है. इसमें सबसे पहले चार वेद-ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद आते हैं. जो जीवन और आचरण के कई पहलुओं को निर्धारित करते हैं. इसके बाद उपवेद हैं, जैसे धनुर्वेद, गंधर्ववेद, आयुर्वेद और अर्थशास्त्र, जो जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े बन, खासकर अर्थशास्त्र आर्थिक विषयों से संबंधित है. उन्होंने बताया कि वेदों को समझने और सुरक्षित रखने के लिए छह वेदांग होते हैं-शिक्षा, व्याकरण, छंद, निरुक्त, ज्योतिष और कल्प. इसके अलावा उपांग भी है.

18 महापुराण और 18 उपपुराणों का किया उल्लेख

मेहता ने आगे कहा कि पुराणों का भी महत्वपूर्ण स्थान है, जिनमें 18 महापुराण और 18 उपपुराण शामिल हैं, साथ ही रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य भी आते हैं. उन्होंने यह बताने की कोशिष की कि हिंदू धर्म एक ही स्रोत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विभिन्न ग्रंथों, परंपराओं और विचारधाराओं का व्यापक संगम है. वही वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कहा कि वकीलों के विभिन्न समूहों द्वारा जिन मुद्दों पर बहस की जा सकती है. उनमें संविधान में निहित मौलिक अधिकार के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए न्यायालय का व्यापक विवेक शामिल है.

उन्होंने कहा कि धार्मिक रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप करने के लिए अदालतों को दी गई विवेकाधिकार सीमित है, लेकिन कुछ अल्पसंख्यकों को.इससे छूट मिल सकती है. न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है, लेकिन केवल मामले दर मामले के आधार पर. वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि सबरीमाला मामले की समीक्षा पर अभी विचार नही किया जाएगा. 9 जजों की संविधान पीठ के सामने प्रस्तुत मामला केवल अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 से संबंधित कानूनी प्रश्नों पर ही विचार करेगा.

जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने एसजी मेहता से कहा कि भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांत (अनुच्छेद 25 और 26)आयरिश संविधान से लिए गए थे. इसका इतिहास एक विशिष्ट कैथोलिक राष्ट्र के शासन से जुड़ा है. इसपर एसजी मेहता ने कहा कि अनुचित 25 और 26 कि व्याख्या प्रस्तावना में निहित विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और पूजा की स्वतंत्रता के संदर्भ में की जानी चाहिए. एसजी मेहता ने कहा कि राष्ट्रपति से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जजों तक देवी-देवताओं के सामने नतमस्तक होते है.

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-भारत एक्सप्रेस



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