Supreme Court on Bail: देश के जेलों में क्षमता से 195 फीसदी कैदी बंद है. दिल्ली के आंकड़े तो चौकाने वाले हैं. दिल्ली की जेलों में लगभग 88 फीसदी कैदी विचाराधीन है. सिर्फ 11.4 फीसदी कैदी ही दोषी ठहराए गए है. सुप्रीम कोर्ट सहित देश के सभी अदालतें जमानत के मामले में आए दिन टिप्पणी करती है और कहती है कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’ है.
हाल ही में दिल्ली दंगों के आरोप में जेल में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की है.
जेल में रखना इस सिद्धांत के खिलाफ
आखिर अदालतों द्वारा क्यों बार-बार इस तरह की टिप्पणी की जाती है. क्योंकि भारतीय संविधान हर नागरिक की जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 21) देता है. इसका मतलब यह है कि जब तक किसी पर दोष साबित नहीं हो जाता, तब तक वह निर्दोष है और उसे सजा के तौर पर जेल में नहीं रखा जाना चाहिए.
आपराधिक कानून का यह मूल नियम है कि कोई भी व्यक्ति तब तक दोषी नहीं माना जाता, जब तक अदालत में उसपर आरोप सिद्ध न हो जाए. इसलिए ट्रायल के दौरान उसे जेल में रखना इस सिद्धांत के खिलाफ है.
आरोपी के मौलिक अधिकारों का हनन
यदि आरोपी भागने वाला नहीं है या सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करेगा, तो उसे जेल में बंद रखना उसके मौलिक अधिकारों का हनन है. किसी आरोपी को मुकदमे के दौरान जेल में रखना सजा नहीं, बल्कि केवल यह सुनिश्चित करने के लिए होता है कि वह कोर्ट में सुनवाई के दौरान मौजूद रहे. यानी कि एक संवैधानिक गारंटी है.
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2022 में भारत की जेलों में विचाराधीन कैदियों की भरमार को देखते हुए सरकार से कहा कि उसे आपराधिक मामलों में जमानत का नया कानून बनाने पर विचार करना चाहिए. क्योंकि बेल की प्रक्रिया में सुधार की अत्यधिक आवश्यकता है.
‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’
47 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’. कोर्ट ने कहा था कि आजादी से पहले अंग्रेजों ने जो कानून बनाया था, हम थोड़े-बहुत संशोधनों के साथ उसी को ढो रहे है. इसको लेकर पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने वर्ष 2024 में कहा था कि हर कोई जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट नहीं जा सकता है.
65 फीसदी कैदियों का दोष साबित नहीं हुआ है. उनके मामलों की सुनवाई चल रही है. जब वे दोषी नहीं है, तो वे जेल में क्यों हैं. 90 प्रतिशत विचाराधीन कैदी ओबोसी, एससी, एसटी वर्ग से हैं. इसलिए हम कानून बनाएंगे. इसलिए सत्ता में आने के बाद हम कानून बनाएंगे.
15 दिनों की पूछताछ के बाद जमानत
जिसके अनुसार जमानत दिए जाने को नियम और जेल को अपवाद बनाया जाएगा. पुलिस या सीबीआई द्वारा 15 दिनों की पूछताछ के बाद सभी आरोपित को जमानत दिए जाने का प्रावधान होगा. सुप्रीम कोर्ट के वकील आशीष चौबे की माने तो देश की अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या जरूर है. अदालत गंभीर मामलों में सोचसमझ कर जमानत देती है.
जबकि अदालत का मानना है कि विचाराधीन कैदियों को नियम के तहत जमानत मिलना चाहिए, उन्होंने यह कहा कि जिस कैदी को भागने की आशंका नहीं है, जो सबूतों के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकता है.
दिल्ली के आंकड़े चौकाने वाले
उसको जमानत दे देती है. वही सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी कुमार दुबे की माने तो सुप्रीम कोर्ट कई बार जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्या पर चिंता व्यक्त कर चुका है. उन्होंने कहा कि जो सिद्धांत है कि जमानत नियम और जेल अपवाद है उसको जमानत मिलनी चाहिए, लेकिन वह मुकदमा के ऊपर निर्भर करता है कि वह किस तरह का केस है.
बता दें कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट प्रिजन स्टेटिस्टिक्स इंडिया 2024 के रिकॉर्ड के मुताबिक दिल्ली के आंकड़े चौकाने वाले है.
लगभग 75% से 77% कैदी विचाराधीन
दिल्ली की जेलों में लगभग 88 फीसदी कैदी विचाराधीन है. सिर्फ 11.4 फीसदी कैदी ही दोषी ठहराए गए है. यहां क्षमता से 194.6 % ज्यादा कैदी है. मेघालय में क्षमता से 163.5 प्रतिशत ज्यादा कैदी दर्ज किए गए. जम्मू कश्मीर में यह दर 148.3% है. मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में 140 %से ज्यादा है.
उत्तर प्रदेश में जेलों में कैदियों की संख्या स्वीकृत क्षमता से लगभग डेढ़ गुना ज्यादा होने का अनुमान है. जबकि जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्या बड़ी तादाद में है. पूरे भारत में लगभग 75% से 77% कैदी विचाराधीन है.
यह भा पढ़ें: NEET UG 2026: नीट पेपर लीक मामले में बड़ा एक्शन; शुभम खैरनार CBI रिमांड पर, 5 आरोपी भेजे गए जेल
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.


