सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में महाराष्ट्र गढ़चिरौली आगजनी मामले में गिरफ्तार दलित अधिकार कार्यकर्ता और अधिवक्ता सुरेंद्र गाडलिंग की ओर से दायर जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान ट्रायल में हो रही देरी पर चिंता व्यक्त की है. जस्टिस जे के महेश्वरी और जस्टिस विजय विश्नोई की पीठ ने पूछा कि क्या किसी व्यक्ति को कई वर्षों तक विचाराधीन कैदी के रूप में रखा जा सकता है. महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू से कोर्ट ने पूछा कि ट्रायल क्यों नही चल रहा है, आप किसी व्यक्ति को बिना ट्रायल के कितने वर्षों तक हिरासत में रखते है. इसपर एएसजी राजू ने कहा कि देरी अभियोजन पक्ष की ओर से नही हो रही है, बल्कि आरोपी की ओर से हो रही है.
उन्होंने कहा कि आरोपी ने आरोप मुक्त करने की मांग को लेकर याचिका दायर कर रखा है, लेकिन सुरक्षा कारणों से वो कभी अदालत में व्यक्तिगत तौर पर पेश नही हुए तो कोर्ट ने एएसजी राजू से पूछा कि जब आरोपी सहयोग नही कर रहा है तो याचिका को खारिज क्यों नही किया जा रहा. कोर्ट ने कहा कि इसपर संबंधित अदालत फैसला दे, और उस फैसले में लिखें की आरोपी बहस नही कर रहा. कोर्ट तीन सप्ताह बाद मामले में अगली सुनवाई करेगा.
वामपंथी कार्यकर्ताओं पर महाराष्ट्र पुलिस की छापेमारी
भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में महाराष्ट्र पुलिस ने कई राज्यों में प्रमुख वामपंथी कार्यकर्ताओं के घरों पर छापे मारे थे और माओवादियों से संपर्क होने के संदेह में दलित अधिकार कार्यकर्ता और अधिवक्ता सुरेंद्र गाडलिंग सहित आधे दर्जन कार्यकर्ताओ को गिरफ्तार किया था. इन गिरफ्तारियों को लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओ ने जबर्दस्त विरोध किया था.
पुलिस ने इस छापेमारी के दौरान प्रमुख तेलुगु कवि वरवरा राव को हैदराबाद और वेनर्न गोंजाल्विस और अरुण फरेरा को मुंबई से गिरफ्तार किया गया था, जबकि ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज को फरीदाबाद और नागरिक अधिकारों के कार्यकर्ता गौतम नवलखा को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था.
इसे भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट में पहुंचेगी टूंडला की 80 साल पुरानी श्री नगर रामलीला पर रोक की याचिका
Also Follow Bharat Express on X
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.



