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सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मामले में सुप्रीम कोर्ट में पांचवे दिन की सुनवाई पूरी!

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई ने एक बार फिर आस्था, समानता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन पर बहस को तेज कर दिया है.

Sabarimala case,
Edited by Shubhra Rai

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि करोड़ों लोगों की आस्था को नजरअंदाज करना आसान नहीं है और सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक संरचनाओं को कमजोर नहीं किया जा सकता. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में फैसला लेते समय संवैधानिक मूल्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.

मामले में अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला दिया गया, वहीं याचिकाकर्ताओं ने महिलाओं के प्रवेश पर रोक को समानता के अधिकार के खिलाफ बताया. सुनवाई में यह तर्क भी सामने आया कि सबरीमाला में सभी भक्त समान होते हैं और वहां जाति या वर्ग का भेद नहीं होता, बल्कि आस्था ही सबसे बड़ी पहचान होती है.

मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर बहस

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पांचवे दिन की सुनवाई पूरी हो गई है. सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है. मामले की सुनवाई के दौरान संविधान पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना आसान नहीं है.

साथ ही यह भी कहा गया कि समाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक संरचनाओं को कमजोर नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने कहा कि आस्था से जुड़े मामलों का फैसला करते समय, संवैधानिक प्राधिकरण को व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं से ऊपर उठना चाहिए.

अनुच्छेद 25, अनुच्छेद 26 का हवाल दिया

साथ ही अंतरात्मा की स्वतंत्रता और व्यापक संवैधानिक ढांचे द्वारा निर्देशित होना चाहिए. संविधान पीठ में शामिल जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि आपने कहा था कि अंतरात्मा की स्वतंत्रता का व्यापक दायर है. क्या आप यह संकेत दे रहे हैं कि जजों के रूप में संवैधानिक कोर्ट के रूप में धर्म और अंतरात्मा को एक समान नहीं माना जा सकता.

क्योंकि भले ही धर्म मेरे लिए व्यक्तिगत हो, लेकिन जब मुझे फैसला सुनाना होता है तो मुझे उस धार्मिक चेतना से ऊपर उठकर संवैधानिक प्रावधानों के साथ संतुलन बनाना होता है. कोर्ट ने वरिष्ठ वकील राजीव धवन द्वारा यह कहा जाना कि अंतरात्मा की स्वतंत्रता के महत्व के बारे में दिए गए तर्को का जवाब देते हुए यह  टिप्पणी की है. मामले की सुनवाई के दौरान पक्षकारों ने संविधान के अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला दिया.

सबरीमाला में कोई जाति वर्ग नहीं

उनका तर्क है कि राज्य को धार्मिक प्रथाओं के मूल स्वरूप में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. वही याचिककर्ताओ का कहना है कि महिलाओं को प्रवेश से वंचित करना समानता के अधिकार के खिलाफ है. सुनवाई के दौरान त्रावणकोर-कोचीन मंदिर प्रवेश नियमों का नियम 6 केवल सबरीमाला मंदिर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण भारत के सभी मंदिरों पर लागू होता है.

इस नियम के अनुसार जब महिलाएं मासिक धर्म से गुजर रही होती है, तो वे अपनी स्वयं की स्वेक्षा और अनुशासन का पालन करते हुए मंदिरों में प्रवेश नहीं करती. यह एक बिना लिखा नियम है, यहां तक कि अपने घरों में भी, वे पूजा -कक्ष में भी नहीं जाती. यह मेरी निजी आस्था है. मैं शायद इसका कोई वैज्ञानिक स्पष्टीकरण न दे सकू.

लेकिन जहां विज्ञान खत्म होता है. वही से आस्था शुरू होती है. उन्होंने कहा कि मैं नियमित रूप से सबरीमाला मंदिर जाता हूं. पारंपरिक हिंदू धर्म में, किसी भी तीर्थयात्रा के दौरान सभी जातियों और समुदायों के बीच के भेद मिट जाते है. सभी लोग एक समान वर्ग का हिस्सा बन जाते है. जब हम सबरीमाला जाते हैं तो वहां कोई जाति/वर्ग नहीं होता. वहां केवल एक ही चीज होती है, जो सबको एक साथ रखती है, वह है भगवान अय्यपा का संप्रदाय, जिसमें सभी तरह के भक्त शामिल होते है.

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-भारत एक्सप्रेस



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