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सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग के महिलाओं को प्रवेश के मामले में दायर पुनर्विचार याचिका पर 14 अप्रैल को भी सुनवाई रहेगी जारी

सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश के मामले में दायर पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई 14 अप्रैल को भी जारी रहेगी. यह सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की पीठ कर रही है.

सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग के महिलाओं को प्रवेश के मामले में दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर 14 अप्रैल को भी सुनवाई जारी रहेगी. सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की पीठ सुनवाई कर रही हैं. जिसमें जस्टिस बी. वी नागरत्ना, जस्टिस एम. एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन मसीह, जस्टिस प्रसन्ना वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल है.

मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी दलीलें पूरी कर ली है. एसजी मेहता ने कहा कि हिंदू धर्म में महिलाओं को हमेशा ऊंचे स्थान पर रखा गया है, इसलिए किसी विशेष मंदिर में महिलाओं या पुरुषों के प्रवेश से जुड़े नियमों को सीधे भेदभाव नही कहा जा सकता है. उन्होंने कहा कि भारत में कई ऐसे मंदिर हैं, जहां परंपराएं अलग-अलग हैं. कही पुरुष के प्रवेश पर रोक है, तो कही महिलाओं के प्रवेश पर. इसका मतलब यह है कि हर मंदिर की अपनी धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं होती हैं, जिन्हें समझे बिना समानता के आधार पर एक जैसा नियम लागू नही किया जा सकता.

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर किसी संप्रदाय में विश्वास रखने वाले व्यक्ति के मौजूदा रीति रिवाजों में बदलाव की मांग, उस संप्रदाय में विश्वास न रखने वाला कोई दूसरा व्यक्ति भी कर सकता है. यदि वे रिवाज उस गैर विश्वासी व्यक्ति की स्वतंत्रता में बांधा डाल रहा है. केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल नटराज ने कोर्ट को बताया कि दक्षिण भारतीय मंदिरों में प्रसाद के रूप में मदिरा दी जाती है. उन्होंने कहा कि कल को आप इस पर यह आपत्ति नहीं उठा सकते कि मदिरा न दी जाए.

धार्मिक प्रथाओं का पालन सभी के लिए अनिवार्य

एएसजी नटराजन ने उदाहरण देते हुए कहा कि कई मंदिरों में शाकाहारी भोजन परोसा जाता है और अगर कोई व्यक्ति अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर कहता है कि वह मांसाहारी भोजन करना चाहता है, तो वह किसी खास सम्प्रदाय के पास जाकर यह नही कह सकता कि मेरा यह अधिकार है और मुझे यही परोसा जाना चाहिए. इसपर जस्टिस बागची ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति नास्तिक है और वह किसी ऐसे मंदिर-मठ में जाता है जिसका मैनेजमेंट किसी विशिष्ट धार्मिक संप्रदाय करता है तो उसे भी उस निर्धारित धार्मिक रीति रिवाजों का पालन करना ही होता है. भले ही उसका अधिकार खतरे में क्यों न आ जाए.

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-भारत एक्सप्रेस



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