सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने 2017 के मानसिक स्वास्थ्य देखभाल (Mental Health Rights) अधिनियम को लागू करने की मांग वाली जनहित याचिका (Public Interest Litigation) पर सुनवाई करते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है. जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की बेंच ने याचिकाकर्ता गौरव बंसल को यह निर्देश दिया. कोर्ट ने केंद्र सरकार से याचिकाकर्ता को हलफनामा उपलब्ध कराने का भी आदेश दिया. इस मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद होगी.
Supreme Court में लगी याचिका में क्या है मांग?
2018 में दायर इस जनहित याचिका में केंद्रीय मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण, राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण और मानसिक स्वास्थ्य पुनरावलोकन बोर्ड की स्थापना में लापरवाही का आरोप लगाया गया है. याचिकाकर्ता ने कानून के प्रभावी कार्यान्वयन की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक समिति गठन का सुझाव दिया था. हालांकि, कोर्ट ने इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि समानांतर तंत्र बनाना संभव नहीं है. कोर्ट ने संकेत दिया कि इस याचिका को एनएचआरसी को स्थानांतरित किया जा सकता है.
छोटे-बड़े सरकार दरगाह का मामला
सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के बदायूं (Badaun) स्थित छोटे-बड़े सरकार दरगाह का मामला भी उठा, जहां मानसिक रोगियों को जंजीरों से बांधकर रखने की प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही नाराजगी जता चुका है. कोर्ट ने कहा था कि मानसिक रोगी भी इंसान है और उसकी गरिमा का सम्मान जरूरी है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंसक मरीजों को अकेले रखा जा सकता है, लेकिन उन्हें जंजीरों से बांधना उनके अधिकारों और सम्मान के खिलाफ है.
कानून के कार्यान्वयन में देरी होना
2017 का मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम मानसिक रोगियों के अधिकारों की रक्षा और उनकी देखभाल के लिए बनाया गया था. याचिका में इस कानून के कार्यान्वयन में देरी और लापरवाही का मुद्दा उठाया गया है. सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सक्रिय कदम उठा रहा है.
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