अजमेर में स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह को लेकर दायर जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है. यह याचिका विश्व वैदिक सनातन संघ के प्रमुख जितेंद्र सिंह और विष्णु गुप्ता की ओर से दायर की गई थी. सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह आदेश दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का प्रभाव सिविल कोर्ट में लंबित मामले में नही पड़ेगा.
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील बरूण सिन्हा ने कहा मेरा मुकदमा सिविल कोर्ट में लंबित है. उन्होंने कहा कि कोर्ट ने 1961 में फैसला सुनाया था कि यह स्थान धार्मिक स्थल नहीं बल्कि चिश्तिया संप्रदाय का इलाका है. दायर याचिका में मांग की गई थी कि अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर प्रधानमंत्री ऑफिस की ओर से हर साल चढ़ाई जाने वाली चादर की परंपरा पर तत्काल रोक लगाई जाए. याचिका में कहा गया था कि यह मामला केवल परंपरा का नही, बल्कि धार्मिक स्थलों की ऐतिहासिक पहचान और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा है.
हिंदी सेना अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने दायर की याचिका
याचिकाकर्ता की माने तो जिस जगह पर दरगाह स्थित है, वहां पहले संकट मोचन महादेव मंदिर था. ऐसे में सरकारी या संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा चादर चढ़ाना उचित नही है. हालांकि प्रधानमंत्री कार्यालय और कई अन्य नेताओं द्वारा उर्स के दौरान अजमेर की दरगाह में हर साल चादर चढ़ाई जाती है. बता दें कि अजमेर के निचली अदालत में हिंदी सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता की ओर से एक याचिका दायर की गई थी.
दायर याचिका में दरगाह को सर्वे करवाने के बाद फिर से हिंदू मंदिर घोषित करने की मांग की गई थी. याचिका में कहा गया था कि दरगाह में भगवान संकट मोचन महादेव को विराजमान किए जाने और वहां हिंदू रीति रिवाह से पूजा पाठ करने की अनुमति दी जाए. साथ ही उस स्थान पर दरगाह को गैरकानूनी बताते हुए दरगाह कमेटी के अनाधिकृत कब्जे को हटाने की मांग की गई थी. अजमेर दरगाह ने इस मांग पर सख्त आपत्ति जताई थी और इसे साजिश करार दिया था.
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-भारत एक्सप्रेस
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