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जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR की मांग वाली याचिका खारिज; सुप्रीम कोर्ट बोला- सस्ती पब्लिसिटी का जरिया

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ 14 मार्च 2025 के कैश कांड में एफआईआर दर्ज कराने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है.

Justice Yashwant Varma cash scandal

इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े बहुचर्चित ‘कैश कांड’ मामले में उनके खिलाफ आपराधिक एफआईआर (FIR) दर्ज करने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है.

याचिकाकर्ता की मंशा पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की दो सदस्यीय खंडपीठ ने इस याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए. शीर्ष अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की जनहित याचिकाएं (PIL) न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने के बजाय केवल “सस्ती पब्लिसिटी” हासिल करने के लिए दाखिल की जाती हैं.

यह याचिका अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय की ओर से दायर की गई थी. याचिकाकर्ता की दलील थी कि यदि किसी गंभीर घटना में संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की स्पष्ट आशंका बनती है, तो केवल न्यायपालिका की आंतरिक ‘इन-हाउस जांच’ (In-House Inquiry) पर्याप्त नहीं हो सकती. ऐसे मामलों में पुलिस या जांच एजेंसी द्वारा तुरंत एफआईआर दर्ज कर स्वतंत्र आपराधिक जांच शुरू की जानी चाहिए.

SIT जांच की उठाई गई थी मांग

उल्लेखनीय है कि इस मामले में दायर नई याचिका पर पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश जस्टिस शील नागू ने खुद को सुनवाई से अलग (Recuse) कर लिया था. दायर याचिका में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ तत्काल आपराधिक एफआईआर दर्ज करने तथा सुप्रीम कोर्ट की सीधी निगरानी में एक स्वतंत्र विशेष जांच टीम (SIT) का गठन कर पूरे मामले की गहन जांच कराने की गुहार लगाई गई थी.

अधजली नकदी मिलने का पूरा घटनाक्रम

याचिका में घटना का ब्योरा देते हुए बताया गया था कि 14 मार्च 2025 को दिल्ली स्थित जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक सरकारी आवास पर अचानक आग लगने की घटना हुई थी. अग्निशमन और राहत कार्य के बाद वहां से भारी मात्रा में जली और आधी जली (अधजली) नकदी (करंसी नोट) मिलने की खबरें सार्वजनिक हुई थीं.

इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय इन-हाउस कमेटी का गठन किया था, जिसमें जस्टिस शील नागू भी शामिल थे. हालांकि, याचिकाकर्ता का तर्क था कि इन-हाउस जांच केवल एक अनुशासनात्मक प्रक्रिया (Disciplinary Procedure) हो सकती है, लेकिन वह किसी भी आपराधिक जांच (Criminal Investigation) का वैधानिक विकल्प नहीं हो सकती.

याचिका के अनुसार, 2 जून 2026 को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI), दिल्ली पुलिस और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को लिखित शिकायतें देकर ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम’ (PCA), मनी लॉन्ड्रिंग कानून (PMLA), भारतीय न्याय संहिता (BNS) और अन्य संबंधित कानूनों के तहत एफआईआर दर्ज करने का अनुरोध किया गया था. लेकिन एजेंसियों द्वारा कार्रवाई न होने पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया था.

संसदीय महाभियोग प्रक्रिया

जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित आवास से भारी मात्रा में अधजली नोट मिलने के बाद 14 मार्च 2025 से ही उनके खिलाफ संवैधानिक महाभियोग (Impeachment) की कार्यवाही शुरू करने की मांग उठ रही थी.

21 जुलाई 2025: जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ संसद में महाभियोग का औपचारिक प्रस्ताव लाया गया था और उसी दिन राज्यसभा के चेयरमैन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.

11 अगस्त 2025: राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था.

12 अगस्त 2025: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 146 सांसदों के हस्ताक्षरों वाले महाभियोग प्रस्ताव को औपचारिक मंजूरी प्रदान की और मामले की जांच के लिए जजेज इन्क्वायरी एक्ट के तहत 3-सदस्यीय जांच कमेटी गठित करने का आदेश दिया.

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वहीं, दूसरी ओर पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा का रुख था कि उनके मामले में ‘न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968’ (Judges Inquiry Act 1968) में तय की गई वैधानिक प्रक्रिया का सही ढंग से पालन नहीं किया गया है. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद आपराधिक जांच की मांग पर पूर्ण विराम लग गया है.



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