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चुनावों में ‘फ्रीबीज’ बांटने वाली पार्टियों की रद्द होगी मान्यता? सुप्रीम कोर्ट जुलाई में करेगा मामले की सुनवाई

चुनाव में मुफ्त की योजनाओं (Freebies) पर लगाम लगाने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट जुलाई के दूसरे सप्ताह में सुनवाई करेगा. सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए पूछा कि ऐसी योजनाओं का खर्च करदाताओं के अलावा कौन उठाएगा?

Supreme Court of India on UCC

चुनाव में मुफ्त की योजनाओं पर लगाम लगाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट जुलाई के दूसरे सप्ताह में सुनवाई करेगा. यह याचिका वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर की गई है. अश्विनी उपाध्याय ने सीजेआई सूर्यकांत से दायर याचिका पर जल्द सुनवाई की मांग की, जिस पर कोर्ट ने सहमति जताते हुए जुलाई का समय तय किया है. दायर याचिकाओं में मुफ्त की चीजें बांटने का वादा करने वाली पार्टियों की मान्यता रद्द करने की मांग की गई है.

उनकी याचिका में कहा गया है कि इस तरह की घोषणाएं एक तरह से मतदाता को रिश्वत देने जैसी बात है. यह न सिर्फ चुनाव में प्रत्याशियों को असमान स्थिति में खड़ा कर देती है, बल्कि चुनाव के बाद सरकारी खजाने पर भी अनावश्यक बोझ डालती है.

‘करदाता के अलावा खर्च कौन उठाएगा?’

इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा था कि अगर आप फ्री बिजली, फ्री खाना और फ्री साइकिल देते हैं तो आप किस तरह का कल्चर बना रहे हैं. कोर्ट ने कहा था कि करदाता के अलावा इन योजनाओं का खर्च कौन उठाएगा. उन्होंने कहा था कि भोजन और बिजली के बाद अब सीधा कैश ट्रांसफर किया जा रहा है. कोर्ट ने कहा कि रोजगार देने पर राज्य सरकार को ध्यान देना चाहिए. सीजेआई सूर्यकांत ने कहा था कि हम किस तरह का कल्चर बना रहे हैं. यह समझ में आता है कि आप एक वेलफेयर कल्चर बना रहे हैं. उन्होंने कहा था कि यह समझ में आता है कि एक वेलफेयर सिस्टम के तहत लोगों को बिजली देना चाहते हैं, जो बिजली का चार्ज नहीं दे सकते. लेकिन जो दे सकते हैं और जो नहीं दे सकते, उनके बीच फर्क किए बिना अगर आप बांटना शुरू करते हैं, तो क्या यह एक तरह की तुष्टिकरण पॉलिसी नहीं होगी?

फिजूलखर्ची से देश का आर्थिक विकास होगा बाधित

कोर्ट ने यह टिप्पणी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की है, जिसमें तमिलनाडु सरकार की कुछ समुदायों के लिए बिजली टैरिफ में सब्सिडी स्कीम को चुनौती दी गई थी. इस स्कीम से पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ा, जिसके खिलाफ तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. कोर्ट ने इलेक्ट्रिसिटी (संशोधन) अधिनियम 2024 के रूल 23 का हवाला देते हुए कहा था कि पावर कंपनियों को टैरिफ के जरिये लागत वसूली सुनिश्चित करनी चाहिए.

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कोर्ट ने कहा था कि इस तरह की फिजूलखर्ची से देश का आर्थिक विकास बाधित होगा. कोर्ट ने कहा था कि जो वहन नहीं कर सकते उनके लिए राज्य का कर्तव्य है कि वह ये सुविधाएं प्रदान करे, लेकिन जो लोग मुफ्त सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं, उनकी जेब में सबसे पहले पैसा जा रहा है. कोर्ट ने कहा था क्या यह ध्यान देने योग्य बात नहीं? हम ऐसे राज्यों को जानते हैं, जहां बड़े जमींदारों को भी मुफ्त बिजली मिलती है. कोर्ट ने कहा था कि हम केवल तमिलनाडु के संदर्भ में ही बात नहीं कर रहे हैं.



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