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राष्ट्रपति और राज्यपालों के बिल निर्णय की समय सीमा पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी

राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा विधेयकों पर फैसला लेने की समय सीमा तय करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में 21 अगस्त को सुनवाई जारी रहेगी. संविधान पीठ की अध्यक्षता सीजेआई बी. आर. गवई कर रहे हैं.

CJI BR Gavai

सीजेआई बीआर गवई

राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयकों पर फैसला लेने के लिए समय सीमा तय करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में 21 अगस्त को भी सुनवाई जारी रहेगी. दूसरे दिन की सुनवाई पूरी हो है है. सीजेआई बी. आर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ सुनवाई कर रही है. संविधान पीठ में सीजेआई बी आर गवई के अलावे जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर शामिल है.

मामले की सुनवाई के दौरान संविधान पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा कि यदि विधेयकों को विधानसभा में वापस आए बिना रोका जा सकता है, तो क्या निर्वाचित सरकारें राज्यपालों की मर्जी पर नहीं चलेगी. सीजेआई गवई ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा आपके मुताबिक यदि राज्यपाल यह घोषणा करते हैं कि विधेयक रोक दिया गया है, तो विधेयक को मान्य माना जाएगा? सीजेआई गवई ने यह भी पूछा कि क्या हम राज्यपाल को विधेयकों पर अपील करने का पूरा अधिकार नहीं दे रहे होंगे ?

कोर्ट ने संविधान निर्माताओं की मंशा पर उठाए सवाल

सीजेआई गवई ने एसजी मेहता से यह भी पूछा कि इस तरह बहुमत से चुनी गई सरकार राज्यपाल की मर्जी पर निर्भर होगी? कोर्ट ने पूछा कि क्या देश संविधान निर्माताओं की इस उम्मीद पर खरा उतरा है कि राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच सामंजस्य होगा. कोर्ट ने कहा कि संविधान निर्माता चाहते थे कि दोनों शक्ति केंद्रों के बीच विभिन्न मुद्दों पर परामर्श भी किया जाएगा.

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि संविधान सभा में राज्यपाल की नियुक्ति और उनकी शक्तियों को लेकर आलोचना होती है कि राज्यपाल का पद राजनीतिक शरण लेने वालों का ठिकाना है, लेकिन असल मे यह पद संवैधानिक जिम्मेदारियों और कुछ निश्चित शक्तियों से जुड़ा हुआ है. पिछली सुनवाई में कोर्ट ने केंद्र सरकार और अटॉर्नी जनरल से यह पूछा था कि आखिर क्यों कई राज्यों के विधानसभा से पास हुए बिल साल 2020 से ही राज्यपालों के पास लंबित पड़े हुए हैं. कोर्ट ने कहा कि यह चिंता का विषय है, लेकिन संवैधानिक दायरे में रहकर ही अपनी राय देगी.

बता दें कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मई में संविधान के अनुच्छेद 143 (1 के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी थी. उन्होंने पूछा था कि क्या न्यायालय यह तय कर सकता है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल को बिलों पर कब तक निर्णय लेना चाहिए. राष्ट्रपति ने अपने पांच पन्नों के संदर्भ पत्र में 14 सवाल रखे हैं, जिनका जवाब सुप्रीम कोर्ट से मांगा गया है.

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भारत एक्सप्रेस



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