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सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच परखेगी 50 साल पुराना फैसला, क्या सरकारी कल्याणकारी योजनाएं भी ‘उद्योग’ हैं?

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ 17 मार्च से औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के तहत ‘इंडस्ट्री’ शब्द की परिभाषा पर सुनवाई शुरू कर रही है.

OBC Reservation Supreme Court

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के तहत उद्योग की परिभाषा में मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान पीठ 17 मार्च से सुनवाई शुरू करने जा रही है. मामले की सुनवाई के लिए सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता में 9 जजों की संविधान पीठ सुनवाई करेगी. इस पीठ में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस पीएस नरसिम्हा, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल है.

यह पीठ औद्योगिक संबंध संहिता 2020 और उससे पहले लागू औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के तहत इंडस्ट्री शब्द के दायरे को स्पष्ट करेगी. वर्ष 1975में जस्टिस वी. आर कृष्णा अय्यर ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ‘इंडस्ट्री’ की पहचान के लिए जो कानूनी कसौटी तय की थी, उसे दोबारा परखा जाएगा. खासतौर पर फैसले के पैरा 140 से 144 में निर्धारित सिद्धांतों की वैधता और व्याख्या पर संविधान पीठ विचार करेगी. पीठ यह भी देखेगी की औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम 1982 और औद्योगिक संबंध संहिता 2020 (जो 21 नवंबर 2025 से प्रभावी है) का मूल अधिनियम में इंडस्ट्री शब्द की व्याख्या पर क्या कानूनी प्रभाव पड़ता है.

संविधान पीठ को यह भी तय करना है कि क्या सरकार द्वारा संचालित कल्याणकारी योजनाओं या सार्वजनिक संस्थाओं की सामाजिक सेवाएं शर्म कानूनों के तहत औद्योगिक गतिविधि मानी जा सकती हैं. पीठ यह भी तय करेगी कि राज्य के कौन से कार्य ऐसे है जो औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (ज)के दायरे से बाहर रखा जा सकता है.

सात जजों की पीठ ने नौ जजों की पीठ को सौंपा मामला

यह विवाद कई वर्षों से अदालतों में विचाराधीन है. वर्ष 2017 में तत्कालीन सीजेआई टी. एस ठाकुर की अध्यक्षता वाली सात जजों की संविधान पीठ ने इस प्रश्न को लेकर उसके गंभीर और व्यापक प्रभाव को देखते हुए नौ जजों की पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया था. इससे पहले मई 2005 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 में इंडस्ट्री की परिभाषा की व्याख्या से जुड़े मुद्दे को बड़ी पीठ के पास भेजा था.

संविधान पीठ ने कहा था कि इस प्रश्न के सभी कानूनी पहलुओं की गहराई से समीक्षा करना आवश्यक है.

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-भारत एक्सप्रेस



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