Reformative Justice System: सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ सुनवाई करते हुए मौत की सजा के निष्पादन पर फिलहाल रोक लगा दी है. अदालत ने चिंता व्यक्त की कि शुरुआती चरणों में अभियुक्त के आचरण और परिस्थितियों की रिपोर्ट न मंगाना एक “परेशान करने वाला चलन” बन गया है, जिससे सुधारात्मक न्याय की संभावना कम हो जाती है.
कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि ट्रायल कोर्ट ऐसी रिपोर्ट नहीं मंगाता, तो हाई कोर्ट को मामले की स्वीकार्यता के दौरान इसे अनिवार्य रूप से मंगवाना होगा. साथ ही, पीठ ने आरोपियों को मिलने वाले अपर्याप्त कानूनी प्रतिनिधित्व पर भी सवाल उठाए और न्याय प्रणाली में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला
मौत की संभावनाओं के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सजा सुनाने से पहले निचली अदालतों को सजा कम करने वाले और बढ़ाने वाले कारकों पर रिपोर्ट मंगानी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शुरुआती चरण में ऐसी रिपोर्ट प्राप्त करने में विफलता संतुलित सजा प्रक्रिया को कमजोर करती है और सुधारात्मक कारकों पर सार्थक विचार में देरी करती है. जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश दिया है.
मौत के निष्पादन पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील की सुनवाई करते हुए ये निर्देश जारी किया है. साथ ही कोर्ट ने दायर अपीलों पर सुनवाई और अंतिम निपटारे तक मौत के निष्पादन पर रोक लगा दिया है.
कोर्ट ने कहा कि मनोज और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य के मामले में यह निर्देश दिया गया था कि निचली अदालतों को मौत लगाने से पहले सजा कम करने वाले कारकों के बारे में जानकारी प्राप्त करनी चाहिए.
कानूनी प्रतिनिधित्व असरदार नहीं हो पाता
कोर्ट ने यह भी कहा कि हमें कई मामलों में सामने आ रहे एक परेशान करने वाले चलन पर गौर करना पड़ रहा है, जिसमें मौत की सजा वाले संभावित मामलों की कार्यवाही के शुरुआती चरणों में ही सजा कम करने वाले और बढ़ाने वाले हालात पर रिपोर्ट नहीं मंगाई जा रही है.
मौत की सजा वाले मामलों में व्यवस्थागत खामियों को उजागर करते हुए कोर्ट ने पाया कि ऐसे कई मामलों में आरोपियों को दी जाने वाली कानूनी मदद का स्तर अपर्याप्त रहता है, जिसके कारण कार्यवाही के अहम चरणों में कानूनी प्रतिनिधित्व असरदार नहीं हो पाता.
संतुलित नजरिया नहीं मिल पाता
कोर्ट ने यह भी कहा कि अपराध की गंभीरता को कम करने वाले और बढ़ाने वाले हालात से जुड़ा डेटा इकठ्ठा करने की कोशिश की कमी की वजह से अदालतों को एक पूरा और संतुलित नजरिया नहीं मिल पाता, जो कि सजा तय करने के सही नतीजे के लिए जरूरी है.
कोर्ट ने कहा अपराध की गंभीरता को बढ़ाने वाले और कम करने वाले हालात से जुड़ी रिपोर्ट, आरोपी के दोषी साबित होने के बाद और सजा तय करने से पहले ट्रायल कोर्ट द्वारा अपने आप मंगवाई जाएगी. कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसी रिपोर्ट ट्रायल कोर्ट के सामने नहीं मंगवाई गई, तो हाई कोर्ट को मौत की सजा के मामले को स्वीकार करने के चरण में अनिवार्य रूप से उसे मंगवाना होगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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