सुप्रीम कोर्ट ने कावेरी जल विवाद से जुड़े मामले में एक सोसाइटी की ओर से दायर उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें कावेरी नदी के 70 टीएमसी (TMC) पानी को तमिलनाडु के हिस्से से निकालकर कर्नाटक के हिस्से में फिर से आवंटित (Re-allocate) करने की मांग की गई थी.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि यदि अदालत दो राज्यों के बीच चल रहे गंभीर विवादों को लेकर किसी सोसाइटी (गैर-सरकारी संस्था) की इस तरह की याचिकाओं पर सुनवाई करने लगी, तो इसका कोई अंत नहीं होगा. कोर्ट ने कहा कि चूंकि तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच जल बंटवारे का मुख्य विवाद पहले से ही अदालत में लंबित है, इसलिए इस याचिका को स्वीकार नहीं किया जा सकता.
तमिलनाडु सरकार की याचिका और कोर्ट की पूछताछ
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में मुख्य रूप से तमिलनाडु सरकार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था. सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने तमिलनाडु की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सी.एस. वैद्यनाथन से सवाल किया था कि आखिर यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत क्यों दायर की गई है.
पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सरकार से जवाब तलब करते हुए पूछा था कि क्या उन्होंने सीडब्ल्यूएमए (CWMA) के आदेशों का पूरी तरह पालन किया है? जवाब में कर्नाटक सरकार ने कोर्ट को बताया था कि तय समयानुसार लगातार पानी छोड़ा जा रहा है, और आंकड़े देते हुए कहा कि आज सुबह 8 बजे तक 12,607 क्यूसेक पानी छोड़ा जा चुका है. अदालत ने तब तमिलनाडु से कहा था कि जब पर्याप्त पानी छोड़ा जा रहा है, तो अब कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए. हालांकि, सुनवाई के दौरान कर्नाटक की ओर से यह भी जानकारी दी गई कि उन्होंने मेकेदातु (Mekedatu) में एक बांध बनाने का प्रस्ताव रखा है.
कर्नाटक सरकार का पक्ष और पानी छोड़ने के आंकड़े
कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना विस्तृत जवाब दाखिल कर तमिलनाडु सरकार और डीएमके (DMK) के सभी आरोपों को खारिज किया है और उनकी याचिकाओं को खारिज करने की मांग की है. कर्नाटक के अनुसार, कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) ने 30 जुलाई को 15 दिनों तक रोजाना 3,500 क्यूसेक पानी छोड़ने का आदेश दिया था.
राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि 29 जुलाई से 10 अगस्त के बीच जलाशयों से कुल 1,64,080 क्यूसेक पानी छोड़ा गया, जिसमें से 86,797 क्यूसेक पानी बिलिगुंदुलु (Biligundlu) गेजिंग स्टेशन तक सफलतापूर्वक पहुंच गया. कर्नाटक का दावा है कि उसने सीडब्ल्यूएमए के सभी निर्देशों का पूरी तरह पालन किया है, इसलिए तमिलनाडु की मांग पूरी तरह निरर्थक है.
तमिलनाडु ने क्या आरोप लगाया?
इसके विपरीत, तमिलनाडु और डीएमके की ओर से दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि कर्नाटक सरकार कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) के आदेशों का पालन नहीं कर रही है. डीएमके ने मांग की थी कि कर्नाटक को सीडब्ल्यूआरसी के 28 जुलाई के निर्देश को तुरंत और पूरी तरह लागू करने का निर्देश दिया जाए.
उल्लेखनीय है कि सीडब्ल्यूआरसी ने अपनी 54वीं आपातकालीन बैठक में जलवैज्ञानिक और मौसम संबंधी स्थितियों का आकलन करने के बाद कर्नाटक को 29 जुलाई से 12 अगस्त 2026 तक कृष्ण राजा सागर और काबिनी जलाशयों से पानी छोड़कर बिलिगुंडलू में 3,500 क्यूसेक जल निकासी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था.
तमिलनाडु में किसानों का अनोखा प्रदर्शन
एक तरफ जहां कानूनी मोर्चे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है, वहीं दूसरी तरफ कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर तमिलनाडु में किसानों का आक्रोश और विरोध प्रदर्शन लगातार तेज हो गया है. किसान नेता अय्या कन्नू (Ayyakkannu) के नेतृत्व में किसानों ने तिरुचिरापल्ली में कावेरी नदी के किनारे रेत के अंदर खुद को आधा दबाकर एक अनोखा और तीखा प्रदर्शन किया.
गौरतलब है कि वर्ष 2018 में केंद्र सरकार ने तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और पुडुचेरी के बीच नदी के पानी के बंटवारे से जुड़े विवाद को स्थायी रूप से सुलझाने के लिए कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) का गठन किया था. इस बोर्ड में नदी बेसिन से जुड़े राज्यों के सदस्यों के अलावा केंद्र सरकार का एक आधिकारिक नॉमिनी भी शामिल होता है.
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