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‘NOC 15 सितंबर तक जारी करें’, एशियन गेम्स के लिए बिलकिस मीर को सुप्रीम कोर्ट से राहत

सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर की फिजिकल एजुकेशन टीचर और कयाकिंग कोच बिलकिस मीर को बड़ी राहत दी है. कोर्ट ने सरकार को 15 सितंबर तक एनओसी और रिलीविंग ऑर्डर जारी करने के निर्देश दिए हैं.

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सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर की फिजिकल एजुकेशन टीचर और कयाकिंग-कैनोइंग कोच बिलकिस मीर को एक बड़े फैसले में बड़ी राहत दी है. शीर्ष अदालत ने जम्मू-कश्मीर सरकार को निर्देश दिया है कि वह बिलकिस मीर का रिलीविंग ऑर्डर, एनओसी (NOC) और सभी आवश्यक प्रशासनिक अनुमतियां जल्द से जल्द जारी करे.

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के उस पूर्व आदेश को भी पूरी तरह से रद्द कर दिया है, जिसमें बिलकिस मीर को रिलीविंग ऑर्डर और एनओसी देने से इनकार कर दिया गया था.

15 सितंबर तक एनओसी और रिलीविंग

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि जम्मू-कश्मीर सरकार 15 सितंबर तक बिलकिस मीर के पक्ष में सभी जरूरी अनुमति, एनओसी और रिलीविंग ऑर्डर जारी करे. आवश्यक अनुमति मिलने के बाद बिलकिस मीर आधिकारिक तौर पर भारतीय राष्ट्रीय कयाकिंग और कैनोइंग टीम के कोच के रूप में अपनी जिम्मेदारी संभाल सकेंगी और आगामी 2026 एशियन गेम्स के सिलसिले में भारतीय टीम के साथ जा सकेंगी.

हंगरी वर्ल्ड कप का मामला

भारतीय कयाकिंग और कैनोइंग एसोसिएशन ने एशियन गेम्स की तैयारी और ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए बिलकिस मीर की सेवाएं 15 फरवरी से 30 सितंबर 2026 तक मांगी थीं. एसोसिएशन ने सबसे पहले 3 फरवरी 2026 को जम्मू-कश्मीर के संबंधित अधिकारियों से उन्हें राष्ट्रीय कोचिंग कैंप के लिए उपलब्ध कराने का आग्रह किया था, और बाद में रिमाइंडर भी भेजे गए, लेकिन स्थानीय अधिकारियों की ओर से कोई निर्णय नहीं लिया गया.

अधिकारियों द्वारा समय पर फैसला न लिए जाने के कारण यह मामला जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट पहुंचा था. हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने 6 मई को अधिकारियों को निर्देश दिया था कि अंतिम निर्णय आने तक उन्हें अस्थायी रूप से भारतीय कोच के रूप में काम करने की अनुमति दी जाए, जिसके तहत उन्हें हंगरी में होने वाले वर्ल्ड कप कार्यक्रम में भी शामिल होना था.

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हालांकि, सरकार ने तब भी अनुमति देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में गया. वहाँ से भी राहत न मिलने पर यह मामला अंततः सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) पहुँचा, जहाँ सभी पक्षों की लंबी जिरह के बाद यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया.



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