सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सहित कई राज्यों के गैरकानूनी धर्म परिवर्तन रोकने वाले कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई 28 जनवरी को तय की है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ताओं को तीन सप्ताह में जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है.
कोर्ट में पक्ष और विपक्ष
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस मामले में सुनवाई होनी चाहिए. वहीं वरिष्ठ वकील सीयू सिंह ने तर्क दिया कि कानून के कुछ प्रावधान आरोपी पर सबूत का बोझ उल्टा डालते हैं. साथ ही कोई भी तीसरा व्यक्ति शिकायत दर्ज कर सकता है, जो गलत हो सकता है.
याचिका किसने दाखिल की
यह याचिका लखनऊ की रूप रेखा वर्मा और अन्य लोगों ने दाखिल की है. इसमें कहा गया है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 25 का उल्लंघन करता है. ये अनुच्छेद समानता, बोलने की आजादी, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धर्म की स्वतंत्रता देते हैं.
कानून में क्या खामी बताई गई
याचिका में आरोप है कि कानून की धारा 2 और 3 बहुत अस्पष्ट और व्यापक हैं. इनमें स्पष्ट नियम नहीं हैं, जिससे पता नहीं चलता कि अपराध क्या है. इससे बोलने की आजादी और धार्मिक प्रचार प्रभावित होता है. कानून को मनमाने तरीके से लागू किया जा सकता है. दंड देने वाले कानून स्पष्ट होने चाहिए, लेकिन यहां अधिकारियों को ज्यादा权力 मिल जाती है. निर्दोष लोग फंस सकते हैं.
2024 के संशोधन पर सवाल
मुख्य चिंता 2024 के संशोधन की है. इसमें शिकायत करने वालों की संख्या बढ़ा दी गई, लेकिन सुरक्षा के नियम नहीं जोड़े गए. इससे गलत शिकायतें बढ़ सकती हैं.
अन्य याचिकाएं भी लंबित
बता दें कि धर्म परिवर्तन रोकने वाले कानूनों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई अन्य याचिकाएं भी लंबित हैं. यह मामला महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मौलिक अधिकारों से जुड़ा है.
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