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NEET पेपर लीक लाठीचार्ज मामला: सुप्रीम कोर्ट 28 जुलाई को करेगा देशव्यापी याचिकाओं पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई सूर्यकांत की पीठ नीट-यूजी पेपर लीक प्रदर्शनों के दौरान छात्रों पर हुए अत्यधिक बल प्रयोग और लाठीचार्ज के खिलाफ दायर याचिकाओं पर 28 जुलाई को सुनवाई करेगी.

CJI Surya Kant Clarifies Reports On Jantar Mantar NEET Protest Hearing.

नीट-यूजी (NEET-UG) पेपर लीक और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर देश भर में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग (लाठीचार्ज) करने के संगीन आरोपों से जुड़ी याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) आगामी 28 जुलाई 2026 को विस्तृत सुनवाई करेगा.

जंतर-मंतर ही नहीं, यह पूरे देश का मामला है

मामले की लाइव सुनवाई करते हुए देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष खंडपीठ ने एक बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था दी. सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठाने और विरोध-प्रदर्शन करने का हर नागरिक का मौलिक अधिकार संविधान द्वारा सुरक्षित है और इसकी हर हाल में रक्षा की जानी चाहिए.

हालांकि, सीजेआई की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह संतुलन भी साफ किया कि घटना के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों दोनों ही पक्षों की तरफ से हुई ज्यादतियों और हिंसा की पूरी निष्पक्षता के साथ जांच होनी चाहिए. कोर्ट ने कहा कि यह संवेदनशील मामला केवल दिल्ली के जंतर-मंतर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के छात्रों से जुड़ा मामला है. सीजेआई ने संकेत दिए कि सुप्रीम कोर्ट ऐसे हिंसक विरोध-प्रदर्शनों और पुलिस की कार्रवाई से निपटने के लिए पूरे देश के लिए एक स्थायी गाइडलाइन (दिशानिर्देश) बनाएगा.

जस्टिस बागची ने उठाए पुलिस की सुरक्षा पर सवाल

सुनवाई के दौरान जब चोटिल पुलिसकर्मियों के परिवार की ओर से पेश हुए वकील ने अदालत से कहा कि प्रदर्शनकारियों के हिंसक होने से कई पुलिसकर्मी भी गंभीर रूप से घायल हुए हैं और उनका पक्ष भी सुना जाना चाहिए, तो पीठ के सदस्य जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने दो टूक कहा कि देश के हर नागरिक की जान कीमती है.

जस्टिस बागची ने केंद्र और पुलिस प्रशासन से तीखा सवाल पूछते हुए कहा कि अदालत यह भी जानना चाहती है कि इतनी भारी भीड़ को नियंत्रित करते समय अग्रिम मोर्चे पर तैनात पुलिसकर्मियों को पर्याप्त और आधुनिक सुरक्षा उपकरण क्यों नहीं मुहैया कराए गए थे? वहीं, सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि यदि शांतिपूर्ण छात्र आंदोलनों के भीतर असामाजिक तत्व (एंटी-सोशल एलिमेंट्स) घुस जाते हैं और माहौल खराब करते हैं, तो संवैधानिक व्यवस्था को उस पहलू से भी कठोरता से निपटना होगा.

मथुरा की तृप्ति कश्यप की याचिका

सुप्रीम कोर्ट में यह मुख्य याचिका मथुरा (उत्तर प्रदेश) की निवासी तृप्ति कश्यप द्वारा दायर की गई है. दायर याचिका मुख्य रूप से नीट पेपर लीक मामले में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा आयोजित ‘संसद मार्च’ और उसके बाद दिल्ली, बिहार सहित पूरे देश में छात्रों पर हुए बर्बर लाठीचार्ज की निष्पक्ष जांच की मांग से जुड़ी है.

याचिका में आरोप लगाया गया है कि बीते 20 जुलाई 2026 को आयोजित संसद मार्च के दौरान शांतिपूर्ण तरीके से मार्च निकाल रहे असहाय प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया. प्रदर्शनकारी छात्रों पर बेरहमी से लाठियां भाजी गईं, आंसू गैस के गोले छोड़े गए और कई निर्दोष लोगों को गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लिया गया. याचिका में यह गंभीर आरोप भी लगाया गया है कि पुलिस के अलावा कुछ सादे कपड़ों (सिविल ड्रेस) में मौजूद अज्ञात लोगों ने भी प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ मारपीट की, जिसकी एक स्वतंत्र एजेंसी से जांच होनी अनिवार्य है.

अनुच्छेद 19 का हवाला

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है. ऐसे में पुलिस की यह दंडात्मक कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है.

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई गई है कि वह दिल्ली पुलिस और संबंधित राज्य पुलिस को तुरंत यह सख्त निर्देश जारी करे कि घटना के दिन की तैनाती के आधिकारिक रिकॉर्ड, पुलिस आदेश, सीसीटीवी (CCTV) फुटेज, ड्रोन कैमरे की फुटेज, पुलिस बॉडी कैमरा की रिकॉर्डिंग, वायरलेस लॉग और अन्य सभी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को तत्काल प्रभाव से सील और सुरक्षित रखा जाए, ताकि सबूतों के साथ कोई छेड़छाड़ न हो सके.

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साथ ही, याचिका में दोषी पुलिस अधिकारियों और सादे कपड़ों में हिंसा करने वाले जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आपराधिक एफआईआर दर्ज कर सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है. याचिकाकर्ता ने यह निर्देश देने का भी अनुरोध किया है कि यदि स्वतंत्र जांच में यह साबित हो जाता है कि प्रदर्शनकारियों पर गैर-कानूनी या अत्यधिक बल प्रयोग किया गया था, तो घायल हुए बेकसूर लोगों और छात्रों को सरकार द्वारा उचित आर्थिक मुआवजा प्रदान किया जाए. कोर्ट अब 28 जुलाई को इन सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करेगा.



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