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अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के लगातार विरोध के बाद कोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान

अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का लगातार विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है. सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली स्पेशल पीठ 29 दिसंबर को सुनवाई करेगी.

Supreme Court took suo motu
Edited by Vaibhav Gupta

अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का लगातार विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है. सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली स्पेशल पीठ 29 दिसंबर को सुनवाई करेगी.

हितेंद्र गांधी का सीजेआइ को लेटर

इससे पहले इसको लेकर पर्यावरण कार्यकर्ता एवं वकील हितेंद्र गांधी ने सीजेआई सूर्यकांत को लेटर लिखा था और लेटर की एक कॉपी राष्ट्रपति को भेजा था. हितेंद्र गांधी ने अपने पत्र में अरावली क्षेत्र के संरक्षण से जुड़े 100 मीटर के नियम की समीक्षा की मांग की है.

उनका कहना है कि केवल ऊंचाई के आधार पर तय किया गया यह नियम अरावली की कई पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण इकाइयों को संरक्षण से बाहर कर सकता है, जो भले ही संख्यात्मक ऊंचाई की सीमा पूरी न करती हूं, लेकिन पर्यावरणीय दृष्टि से काफी अहम है.

नई परिभाषा से पर्यावरण संरक्षण को नुकसान

हितेंद्र गांधी द्वारा लिखे गए पत्र में उन्होंने कहा है कि केवल ऊंचाई के आधार पर तय की गई परिभाषा उतर पश्चिम भारत में पर्यावरण संरक्षण को नुकसान पहुंच सकता है. वहीं, पर्यावरण विशेषज्ञ और उदयपुर विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस चांसलर डॉक्टर धीरज कुमार शर्मा ने इसे भविष्य के लिए बड़ा खतरा बताया है. उन्होंने कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए पुनर्विचार की मांग की है.

साथ ही सरकारों को भी पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की सलाह दी है. सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को दिए अपने फैसले में कहा है कि ऐसी कोई भी जमीन जिसकी ऊंचाई स्थानीय भू-भाग (जमीन) से 100 मीटर या उससे अधिक हो, यदि दो या उससे अधिक ऐसी पहाड़ियां 500 मीटर के दायरे में है, तो उन्हें एक ही पहाड़ियों का समूह माना जाएगा.इन पहाड़ियों और रेंज के भीतर आने वाले सभी लैंडफॉर्म, उनकी ऊंचाई या ढलान चाहे जो हो, खनन से बाहर रहेंगे.

समय के साथ घिस चुकी पर्वतमाला

बता दें कि अरावली पर्वत श्रृंखला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, जो समय के साथ काफी हद तक घिस चुकी है. अधिवक्ता गांधी ने कहा है कि इसकी पारिस्थितिक भूमिका केवल ऊंची चोटियों तक सीमित नहीं है.

वहीं, कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां, चट्टानी उभार, ढलान, जल पुनभरण क्षेत्र और आपसी संपर्क वाले भू भाग भी भूजल संरक्षण, धूल और मरुस्थलीकरण को रोकने, जैव विविधता को बनाए रखने और दिल्ली एनसीआर के सूक्ष्म जलवायु संतुलन में अहम भूमिका निभाते है.

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-भारत एक्सप्रेस



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